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कवि माघ और बुढ़िया की हिंदी कहानी बच्चों के लिए kavi Magh or budhiya ki Hindi story for kids

कवि माघ और बुढ़िया की हिंदी कहानी बच्चों के लिए | kavi Magh or budhiya ki Hindi story for kids
उज्जैन के राजा भोज परमार वंश के एक महान शासक थे, जो अपनी विद्वत्ता, वीरता और कला संरक्षण के लिए प्रसिद्ध थे, उन्हें सम्राट विक्रमादित्य का वंशज माना जाता है| कहा जाता है कि राजा भोज के दरबार में भीनमाल (राजस्थान) के निवासी कवि माघ भी रहा करते थे | कवि माघ विद्वान तो थे पर उनको अपने ज्ञान पर बहुत अहंकार था | एक बार राजा भोज और कवि माघ अपने राज्य में भ्रमण करने के लिए छद्म वेश में निकले , शाम के समय जब वे वापिस राजमहल की तरफ जा रहे थे , घने जंगल के कारण वे रास्ता भूल गये तो उन्होंने किसी से रास्ता पूछना उचित समझा| उनको रास्ते में एक झोपड़ी के आगे एक बुढ़िया बैठी दिखाई दी, जो चरखा कात रही थी |

कवि माघ ने आगे बढ़कर उस वृद्धा के पास जाकर अहंकार से पूछा, “बुढ़िया! ये रास्ता कहाँ जाएगा?”
बुढिया ने माघ को उसकी आवाज से ही पहचान लिया और बिना सामने देखे ही बोली “ मैं जन्म से देख रही हूँ ये रास्ता यहीं का यहीं है , इस पर लोग आते है जाते है, पर आप कौन हो”?
माघ ने उत्तर दिया कि “हम तो यात्री है”|
बुढिया ने कहा कि “ यात्री तो दो ही है इस संसार में एक तो सूरज और दूसरा चन्द्रमा”| सच बताओ तुम कौन हो ?
बुढिया की बात सुनकर अबकी बार थोड़ा सोच कर माघ ने कहा कि “हम तो क्षण भंगुर मनुष्य हैं”|
बुढ़िया ने कहा कि क्षण भंगुर तो दो ही चीजें हैं संसार में , एक तो यौवन और दूसरा धन , पर तुम कौन हो ?”
माघ को अब घबराहट होने लगी और राजा भोज के समक्ष अपना अपमान होता देख वे बोले “हम राजा है”|
बुढिया ने कहा कि “राजा तो दो ही है संसार में, एक तो यमराज और दूसरा इन्द्रराजा , तुम राजा नहीं हो , सच बता दो आप कौन हो ?”
अब माघ घबरा गए और बोले अपनी अकड़ को छिपाते हुवे बोले “हम सहन करने वाली आत्मा है |
बुढिया ने कहा कि “सहन करने वाली तो इस संसार में दो ही है एक तो धरती और दूजी नारी”|
अब माघ ने हाथ जोड़ कर कहा कि “हम हार गये, अब आप रास्ता बता दो”
बुढ़िया ने कहा कि हारते तो दो ही लोग एक तो ऋण का बोझ लेने वाला और दूसरा जो चरित्रहीन हो, पर तुम कौन हो ?”|
अब माघ के पास कोई उत्तर नहीं था वे चुप हो गये |

माघ को चुप देख कर बुढ़िया ने कहा “ तुम कवि माघ हो , मैं तुम्हें जानती हूँ , तुमको इतना अहंकार नहीं करना चाहिए”|कवि माघ ने उसके पाँव छुवे और अपनी गलती मान कर क्षमा मांगी |
बुढ़िया ने उनको अपने महल जाने का रास्ता दिखा दिया और वे महल आ गये | इस प्रकार कवि माघ और बुढ़िया के मध्य हुई ज्ञान वार्ता से सीख कवि का अहंकार टूट गया |
शिक्षा : इस कहानी के माध्यम से यह शिक्षा मिलती है कि ज्ञान के साथ विवेक का होना अनिवार्य है , अहंकार ज्ञान का शत्रु है |
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