नैतिक धन का महत्व
Muni Agastya_hindi moral story
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मुनि अगस्त्य के आश्रम में अलग अलग राज्यों के बहुत सारे बालक पढ़ते थे, मुनि और उनकी पत्नी लोपामुद्रा इन सभी बालकों को अपनी संतान की तरह सभी प्रकार की विद्याओं से पारंगत करते थे। उनको ग्रन्थ ज्ञान के साथ साथ सांसारिक ज्ञान, आध्यात्मिक ज्ञान, आर्थिक ज्ञान, नैतिक ज्ञान की शिक्षा भी देते थे। ये सभी बालक अपनी शिक्षा पूर्ण कर अपने-अपने राज्यों में जाकर अपना राज करते या अपना व्यवसाय करते थे।
एक बार मुनि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा ने अपने लिए कुछ आभूषणों की इच्छा मुनि के आगे व्यक्त की। मुनि ने समझाया कि हम तो विरक्त प्राणी हैं, अपने को ऐसी वस्तुओं से मोह नहीं रखना चाहिए।
पर स्त्री स्वभाव का आभूषणों के प्रति मोह के चलते वे बार-बार उनके प्रति आग्रह करती रहती थी।
एक दिन मुनि ने कहा कि हम अपने शिष्यों के पास चलेंगे परन्तु जिस शिष्य का नैतिक रूप से अर्जित धन बचत होगा तो ही हम उससे आभूषणों हेतु कहेंगे और वो स्वीकार करेंगे। नैतिक धन का महत्व ही होता है |
लोपामुद्रा भी इस बात से सहमत हो गई।
अवकाश मिलने पर मुनि अगस्त्य और लोपामुद्रा अपने शिष्यों के राज्यों में जाने के लिए निकले।
सबसे पहले वे अपने श्रेष्ठ शिष्य श्रुतर्न के वहां पहुंचे, राजकुमार श्रुतर्न ने गुरु और गुरुमाता का आर्द्र सत्कार किया। गुरु के आने पर शिष्य ने अपने राज्य का संपूर्ण लेखा-जोखा उनके समक्ष रखा। गुरु ने देखा कि संपूर्ण राज्य की आय और व्यय के बाद थोड़ा सा धन बचत है जो राजा के अपने खर्च के लिए पर्याप्त है ।जब वे वहां से जाने लगे तो शिष्य ने उनको भेंट स्वरूप कुछ आभूषण और धन देना चाहा पर दोनों ने अस्वीकार कर लिया ।
वे अपने शिष्य को आशीर्वाद देकर अगले राज्य की ओर चले। अगला शिष्य बाग्नाश्व था, ठीक उसी प्रकार इस शिष्य के पास भी बचत नहीं थी।
इस प्रकार वे अपने बहुत सारे शिष्यों के घर गए, पर किसी के भी पास बहुत सारा धन नहीं था।
चलते चलते वे बिल्बन नाम के शिष्य के नगर पहुंचे, शिष्य ने जब अपने गुरु के आगमन की सूचना सुनी तो अपने नौकर चाकर को सामने भेजा। घर आने पर गुरु और गुरुमाता का बहुत स्वागत किया। विभिन्न प्रकार के व्यंजन और खाद्य सामग्री बनाईं।
सुबह जब उसने अपनी समस्त कमाई का ब्यौरा दिया तो वह तो बहुत अधिक धनी था।
अगले दिन शिष्य ने अपने गुरु को बहुत सारे आभूषण और धन भेंट किया पर गुरु ने स्वीकार नहीं किया और वहां से पुनः अपने आश्रम आ गए।
अब लोपामुद्रा ने पूछा कि आपने बिल्बन की भेंट स्वीकार क्यों नहीं की, उसके पास तो बहुत सारा धन बचत था ।
मुनि अगस्त्य ने कहा कि किसी राजा के पास अगर इतना अधिक धन है तो निश्चित ही उसने अनैतिक ढंग से इकट्ठा किया है , अपनी प्रजा का शोषण किया होगा।
अन्य सभी शिष्य जिनके पास गए वो नैतिकता से अपना जीवन जी रहे इस कारण उनके पास जरूरत से ज्यादा धन नहीं था । हमारी दी गई शिक्षा को वे अपने जीवन में अपना रहे हैं।
इस उत्तर के बाद लोपामुद्रा ने फिर कभी आभूषणों के लिए आग्रह नहीं किया।
शिक्षा :– अनैतिक रूप से कमाया गया धन और अनैतिक व्यवहार से कभी भी जीवन में सुख और शांति नहीं मिल सकती।