जब बुद्ध ने गिलहरी से सिखा
Jab budh ne gilahari se sikha_Hindi story for kids
महात्मा गौतम बुद्ध ने सत्य की खोज में रात को चुपके से अपना राज्य, घर-परिवार त्याग कर जंगल की ओर प्रस्थान किया | राज महलों में ऐशो आराम का जीवन जीने वाला अब जगलों में भूखा प्यासा , सर्दी गर्मी में ईश्वर और सत्य की खोज में लगा हुवा था | कई दिनों के अपने ऐसे जीवन और कष्टों से उनका इरादा डगमगाने लगा , वे जो निश्चय करके निकले थे कि वे सत्य की खोज करेंगे| बुद्ध ने धीरे धीरे अपने इरादे को भूल कर वापिस घर जाने का मानस बना लिया, और एक दिन वे रवाना भी हो गये|
घर वापसी के रास्ते में एक झील के किनारे वे अपनी प्यास बुझाने के लिए रुके| पानी पी कर जब वे बैठे थे, वंहा पास ही एक गिलहरी बार बार पानी के पास आती है और उसमें डूबकी लगा फिर बाहर सूखी मिट्टी में जा कर लोट-पोट हो खुद को सुखाती है, और फिर वैसा ही करती है फिर से पानी में , भीग कर मिट्टी में लोटना|
गिलहरी का ऐसा बार बार करना बुद्ध काफी समय से देख रहे थे, पहले तो उन्होंने सोचा शायद खेल रही होगी, पर एक ही क्रिया, करने का तरीका भी एक ही | बुद्ध की जिज्ञासा उनको गिलहरी के पास ले आई और उन्होंने गिलहरी को गौर से देखा फिर पूछा कि “तुम ये क्या कर रही हो बार बार?, ये कैसा खेल है?”
गिलहरी ने बुद्ध की बात अनसुनी कर दी और अपने काम में लगी रही |
बुद्ध ने फिर वही सवाल किया तो अबकी बार गिलहरी ने कहा कि इस झील के पानी में मेरे बच्चे डूब गये है मैं उनको बहार लाना चाहती हूँ इसलिए इस झील के पानी को सुखा रही हूँ|
बुद्ध को इस बात पर हँसी भी आई और आश्चर्य भी हुवा, बुद्ध ने उससे कहा कि “देखो ये मुर्खता है, इतनी बड़ी झील तुम कब सुखा पाओगी?, और फिर तुम्हारे इतने से शरीर में मामूली सा पानी मिट्टी में जाता है, छोड़ दो ये काम”|
गिलहरी ने कहा “देखो ! मैंने ये निश्चय किया है कि जब तक इस झील को सुखा कर अपने बच्चे प्राप्त नहीं कर लेती, मैं हार नहीं मानूँगी|
बुद्ध ने फिर उसे समझया कि “ये तुम्हारे लिए बहुत कठिन है”|
गिलहरी ने उसकी तरफ थोड़ा क्रोध से देखा और बोली “तुम फालतू बातों में मेरा समय खराब कर रहे हो, चले जावो यंहा से !, मुझे मेरा काम करने दो”|
बुद्ध ने फिर उसे कुछ कहा पर अबकी बार गिलहरी ने कान बहरे कर दिए और अपने काम में लग गई |
बुद्ध वहां से अपने घर की ओर रवाना हो गये , रास्ते में चलते चलते उनके मन में विचार आया कि ऐसा ही पक्का इरादा करके मैं भी सत्य की खोज में निकला था पर अब कहाँ जा रहा हूँ?|
जब एक छोटी सी गिलहरी अपने निश्चय पर दृढ़ है और मैं अपने निर्णय को भूल कर वापिस घर चल दिया जिसको त्याग कर आया था, मेरा तो निर्णय सत्य की खोज थी फिर ये कदम किस तरफ जा रहे है?|
नहीं !, कदापि नहीं !
बुद्ध ने तत्काल अपने को रोका और फिर दृढ़ निश्चय कर एक बरगद के पेड़ के नीचे समाधी लगा दी और कठोर तपस्या से उनको आत्मज्ञान प्राप्त हुवा और वे महात्मा बुद्ध बन कर उठे| जब बुद्ध ने गिलहरी से सिखा तभी वो अपने निश्चय पर अडिग रहे |
शिक्षा :- एक बार सोच समझकर जो निर्णय लो उस को दृढ़ निश्चय के साथ पूरा करो|
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