Kadvi kakadi or meetha sabak
कड़वी ककड़ी की कहानी
Kadvi kakadi or meetha sabak
काफी समय पहले लुकमान नाम के मुस्लिम फ़क़ीर हुवे , उनका बचपन बहुत कष्ट में बीता | अपने जीवन यापन के लिए एक सुल्तान के यंहा पर नौकरी करने लगे और फिर अपने ईश्वर के प्रति गहरी श्रध्दा और लोगों की भलाई करने के कारण बहुत ही प्रसिद्ध हुवे |
जब वे सुल्तान के यहाँ नौकर थे उस समय की बात है , एक दिन सुल्तान को ककड़ी खाने की इच्छा हुई |

लुकमान ताजा ककड़ी लेकर आया और साफ धो कर सुल्तान को दे दी | सयोंग से वह ककड़ी कड़वी थी , सुल्तान ने जैसे ही एक टुकड़ा चबाया तो उसका स्वाद कड़वा जान कर कुछ बोले नहीं | सुल्तान ने सोचा कि लुकमान जान बुझकर कड़वी ककड़ी खिलाना चाहता है तो उन्होंने लुकमान को अपने पास बुलाया और कहा लो लुकमान ये ककड़ी तुम खा लो |
सुलतान द्वारा ककड़ी देने पर लुकमान ने ले ली और खाने लग गया और वह पूरी खा भी गया |
तब सुल्तान ने लुकमान को आश्चर्य से पूछा “ लुकमान ये ककड़ी तो खारी थी फिर भी तुम खा गये और कुछ शिकायत भी नहीं करी”|

लूकमान ने कहा कि “हुजुर! आप रोजाना मीठा भोजन देते हो , और आज अगर थोड़ी सी कड़वी ककड़ी दे दी तो शिकायत क्या करनी , जैसी थी खा ली |
शिक्षा :- लगातार भोग रहे सुख में कभी थोड़ा सा दुःख आ जाये तो उसे सहर्ष स्वीकार करना सीखे|
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