श्री कृष्ण का साथ फिर भी अर्जुन हारे |जब अर्जुन की हार हुई |
Arjun ki haar hindi story for kids
महाभारत युद्ध के बाद की एक रोचक पौराणिक कहानी
जब अर्जुन की हार हुई | Arjun ki haar hindi story for kids
सनातन धर्म और संस्कृति का ज्ञान
जब अर्जुन की हार हुई | Arjun ki haar hindi story for kids
सदाचारी की जीत जब अर्जुन की हार हुई |
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महाभारत का युद्ध समाप्त हो चूका था, महाराजा युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया | अश्वमेध यज्ञ के लिए एक बलशाली घोड़ा छोड़ा गया, इस घोड़े के पीछे संरक्षक के रूप में अर्जुन(Arjun) को नियुक्त किया गया|

अनेकों राज्यों में युद्ध पताका लहराता हुवा घोड़ा आगे बढ़ रहा था , अंत में वो चम्पापुरी राज्य की सीमा में प्रविष्ट हुवा | चम्पापुरी में उस समय राजा हंसध्वज का राज था, हंसध्वज ने अपने पुत्र सुधन्वा को घोड़े की लगाम थामने को कहा|
पिता की आज्ञा पाते ही राजकुमार सुधन्वा ने घोड़ा थाम लिया|

और लाकर अस्तबल में बांध दिया। अब क्या था? नियमानुसार युद्ध होना निश्चित हो गया| एक और सुधन्वा अपनी सेना के साथ था तो दूसरी और पांडव अपने दल बल के साथ खड़े थे |
दोनों सेनाओं में घनघोर युद्ध होने लगा , अर्जुन अपनी पूरी ताकत के साथ सुधन्वा की सेना को निशाना बनाने में लगा था , और सुधन्वा उसका बड़े ही सहास के साथ अपना बचाव करते हुवे सामना कर रहा था |

एक सप्ताह बाद भी युद्ध किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहा था , अर्जुन ने आज प्रतिज्ञा की कि आज अगर मैं सुधन्वा को तीन बाणों से ना मार पाया तो कल से कभी शस्त्र धारण नहीं करूँगा | अर्जुन को भरोसा था कि श्रीकृष्ण उसके पक्ष में है सो वह अपनी प्रतिज्ञा से आश्वस्त था |
उधर सुधन्वा ने जब अर्जुन की प्रतिज्ञा का समाचार सुना तो उसने भी प्रतिज्ञा की कि मैं आज अर्जुन को ना मार सका तो शस्त्र चलाना ही छोड़ दूंगा |
सुबह नियत समय पर युद्ध की दुदुंभी बज उठी , दोनों राजकुमारों ने अपने अपने तरकश से तीर निकाल धनुष पर चढ़ा दिया | श्रीकृष्ण ने अर्जुन की प्रतिज्ञा पूर्ण होने के लिए कहा कि “मुझे गोवर्धन पर्वत को धारण करने से जो पुण्य मिला था वो सब अर्जुन को देता हूँ”, अतः उसकी जीत निश्चित हो |
उधर सुधन्वा ने कहा कि “मैंने आज तक मेरी एक ही पत्नी के सिवाय किसी के बारे में नहीं सोचा, अतः इसका जो पुण्य मिला उसके कारण अर्जुन का धनुष कट जाये”|
अर्जुन ने बाण छोड़ा और सुधन्वा ने अपने बाण से उस बाण को काट दिया|
अर्जुन ने दूसरा बाण चढ़ाया , श्रीकृष्ण फिर बोले “मेरे द्वारा एरावत हाथी को बचाने पुण्य अर्जुन को लग जाये” |
उधर सुधन्वा ने कहा कि “मैंने जीवन में कभी उद्दंड नहीं किया, इसके पुण्य स्वरुप अर्जुन का बाण कट जाये” | और फिर दूसरी बार भी अर्जुन का बाण सुधन्वा ने काट दिया |
अब अर्जुन ने तीसरा और अंतिम बाण चढ़ाया और श्रीकृष्ण ने कहा कि “मैंने इस धरती की सौ बार राक्षसों से रक्षा की , उसका पुण्य अर्जुन को लग जाये”|
दूसरी तरफ सुधन्वा ने कहा कि “मैंने आज तक सनातन धर्म की संस्कृति की रक्षा की, इसका पुण्य अगर है तो अर्जुन का बाण कट जाये”|
और अर्जुन के तीसरे बाण को भी सुधन्वा ने काट दिया | सुधन्वा की जीत हुई |

अर्जुन के साथ श्रीकृष्ण के होते हुवे भी सदाचारी सुधन्वा को विजयश्री प्राप्त हुई|
शिक्षा :- सदाचार से प्राप्त पुण्य को ईश्वर भी नहीं मिटा सकता है |