सौन्दर्य का अभिमान और उसका फल
बहुत प्राचीन जमाने की बात है कलिंग राज्य में पल्लू नाम का एक गांव था , वहां पर एक शिल्पकार रहता था , शिल्पकार का नाम चंकु था चंकु की एक बहुत सुंदर लड़की थी जिसका नाम देवासी था। देवासी बहुत सुंदर थी और उसकी सुंदरता की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी ।

देवासी को प्राप्त करने के लिए बहुत सारे सामंत पुत्र और यहां तक की कलिंग का राजकुमार भी सपने देख रहा था। देवासी को भी अपनी सुंदरता पर बड़ा अभिमान था वह बड़े-बड़े राजकुमारों को अपनी अंगुली पर नचाती थी तथा सुंदर से सुंदर युवक भी उसे पसंद नहीं आते थे।
एक बार एक धनंजय नाम का सुंदर युवक उसके गांव से गुजरा, रात हो जाने के कारण वह चंकु के यहां ठहर गया । चंकु ने समझा कि यह भी कोई नवयुवक है जो देवासी का हाथ मांगने आया होगा । रात ठहरने के दौरान देवासी ने कई बार उस युवक को देखा किंतु धनंजय ने उसमें कोई रुचि नहीं दिखाई और उसे पसंद नहीं आई। जबकि धनंजय का विवाह करने का कोई इरादा नहीं था ।
अगले दिन चंकु ने उस युवक को अपने द्वारा बनाई गई एक सुंदर मूर्ति दिखलाई उसे युवक ने उसकी बहुत प्रशंसा की। फिर चंकु ने पास ही खड़ी अपनी पुत्री देवासी का भी परिचय करवाया जब उस युवक ने देवासी का परिचय पाया तो उसने तुरंत कहा कि मैंने तुम्हारे बारे में तो बहुत सुन रखा है आज तुम्हें देखा भी परंतु याद रखो यह रूप और यौवन केवल चार दिन का मेला है। ऐसा कहकर वह वहां से रवाना हो गया |
देवासी का अपने रूप और यौवन का अभियान चकनाचूर हो गया, वह सोचने लगी कि आज दिन तक कोई भी ऐसा युवक मेरे रूप और यौवन को इस तरह नजरअंदाज करके नहीं गया अवश्य यह कोई उत्तम चरित्र का व्यक्ति होगा, मुझे इसी से विवाह करना होगा। देवासी के ऐसा निर्णय करने से पहले वह युवक उस गांव की सीमा को छोड़कर बहुत दूर जा चुका था ।
शिक्षा :_ इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में रूप और यौवन कुछ समय के लिए होता है उसकी सार्थकता जीवन को सुंदर बनाने में है उस पर घमंड करने में नहीं।