karm se koi heen nahi hota story
श्री कृष्ण की सीख, कर्म से कोई हीन नहीं होता|
karm se koi heen nahi hota story
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चूका था , भगवान श्री कृष्ण अपना धर्म निभा कर अपनी राजधानी द्वारिका की ओर रवाना हो गये | कुरुक्षेत्र से द्वारिका जाने वाले रास्ते में मरुप्रदेश का रेगिस्तान पड़ता है | मरुप्रदेश में पीने के पानी का विकत संकट होने के कारण यह प्रदेश निर्जन हुवा करता था | इसी निर्जन रेगिस्तान के रास्ते में उत्तक मुनि का आश्रम था | रास्ते की थकान के चलते श्री कृष्ण रात्रि विश्राम के लिए मुनि उत्तक के आश्रम में ठहर गये |

श्री कृष्ण ने मुनि को प्रणाम किया और मुनि ने श्री कृष्ण के आगमन का यथेष्ट आदर सत्कार किया , भोजन आदि करने के बाद वार्तालाप होने लगी |
मुनि उत्तक ने जिज्ञासावश श्री कृष्ण से प्रश्न किया “हे भगवन ! कौरवों के पास अपार सैन्य शक्ति थी, जबकि पांडव नगण्य थे। फिर भी कौरवों की हार का क्या कारण है?
श्री कृष्ण ने मुनि की जिज्ञासा शांत करने के लिए कहा कि “हे मुनिवर ! सद् विवेक के मर जाने पर, सत्य को अस्वीकार कर , अन्याय की राह पर चलना कौरवों की हार का कारण रहा”
प्रातः समय श्रीकृष्ण द्वारिक के लिए प्रस्थान करने लगे तो मुनि उत्तक से पूछा “ मेरे द्वारा कोई आपकी सेवा हो सके तो अवश्य कहे”|
तब उत्तक मुनि ने कहा “ प्रभु ! इस निर्जन रेगिस्तान में जल का बहुत अभाव है जल की पूर्ति हो जाये तो आपकी कृपा होगी”|
श्री कृष्ण ने मुनि की मांग को स्वीकार करते हुवे कहा कि “ मुनिवर , आप को जब भी जल की जरुरत हो , आप मेरा स्मरण करे आपको जल उपलब्ध हो जायेगा”

ऐसा आशीर्वाद दे कर श्री कृष्ण द्वारिका चले गये | कुछ दिन बाद मुनि को एक दिन किसी सुनसान रास्ते में जाते समय प्यास लगी पर आसपास कंही पानी नहीं था | मुनि उत्तक को श्री कृष्ण का वचन याद आया | उन्होंने अपनी ऑंखें बंद कर श्री कृष्ण का स्मरण किया | कुछ ही समय में एक चंडाल हाथ में पानी का पात्र लिए उनके सामने खड़ा है और वो कहने लगा “ मुनिवर ! आपको शायद प्यास लगी है मेरे पास जल है आप चाहे तो अपनी प्यास तृप्त कर सकते है |
चंडाल को देख कर वो पानी का आग्रह करने पर मुनि तो बौखल्ला गए , उसको दुत्कार दिया और वंहा से भगा दिया |
चंडाल के वंहा से जाने के बाद श्री कृष्ण प्रगट हुवे तो मुनि क्रोध में कहने लगे कि ये आपने क्या कर दिया?, पानी देकर किसे भेज दिया? मेरा तो सारा जीवन ही दूषित हो जाता |
श्री कृष्ण ने कहा “मुनिवर आपके लिए इंद्र स्वयं पानी ले कर आये थे , पर आपने उनको दुत्कार दिया, आपके लिए तो सब मनुष्य एक समान है , किसी को कर्म के आधार पर आपने दुत्कार दिया , ये आपको शोभा नहीं देता, मनुष्य को अपने कर्म से ऊँचा नीचा नहीं माना जाना चाहिए, कर्म से कोई हीन नहीं होता है|
श्री कृष्ण की बात सुन कर मुनि उत्तक को अपने किये व्यव्हार पर बहुत पछतावा होने लगा |
शिक्षा :- मनुष्य की पात्रता का आधार उसका कर्म नहीं उसका व्यवहार होता है|
ऐसी ही अन्य कहानियाँ पढने के लिए क्लीक करे —– https://indicstories.in/