जादुई ईमानदारी और तीन अंगूठियां
जंगल में मिली एक कीमती हीरे की अंगूठी क्या तीन भाइयों के बीच हमेशा के लिए दीवार खड़ी कर देगी, या किशन काका की समझदारी से घर में खुशियां लौटेंगी? जानने के लिए यह दिलचस्प कहानी पढ़ें।
शहर के पास बसे मेरे छोटे से गाँव में किशन काका के तीन पुत्र थे , तीनों ने पढाई तो ज्यादा नहीं करी पर वे किशन काका के साथ खेती-बाड़ी करते थे , और खाली समय में वे पास के जंगल से लकड़ी काट कर ले आते थे | इन तीनों की एक बुरी आदत थी आपस में एक दुसरे से भाइयों की तरह प्रेम नहीं था , अक्सर छोटी-छोटी बातों पर लड़ते रहते थे , किशन काका भी खूब समझाते पर वे इसकी परवाह नहीं करते थे |
एक दिन तीनों भाई शाम के समय जंगल से लकड़ी काट कर घर की तरफ आ रहे थे तो अचानक एक सोने की अंगूठी दिखाई दी जिसमें लगा हीरा चमक रहा था , बड़ा भाई सबसे आगे चल रहा था , उसने तुरंत उस अंगूठी को उठा लिया और दोनों भाइयों को दिखाई, तीनों बड़े ही खुश हुए | थोड़ा आगे चलने पर तीनों में बहस होने लगी कि इसको पहले कौन पहनेगा?
तीनों भाई घर पहुँचे और किशन काका के सामने अंगूठी रख दी और कहा कि ये हमें रास्ते में गिरी हुई मिली है, और सबसे पहले बड़े भाई ने देखी और उसी ने उठाई पर हम तीनों का हक़ बराबर है इसलिए सबसे पहले कौन पहने ये बता दो ?
किशन काका ने देखा तो समझ गये कि अब ये हमेशा इस को लेकर लड़ते रहेंगे , उन्होंने समझाया कि ये जिसकी भी है हम इसको पुलिस थाने में जमा करा देते है ,जो भी इसका वास्तविक मालिक होगा वो ले जायेगा |
लड़कों ने किशन काका की इस बात को मानने से इंकार कर दिया और लड़ने लग गये , आखिर किशन काका के ना चाहते हुवे सप्ताह के दो-दो- दिन के लिए तीनों को पहनने के तय कर दिए और एक दिन खुद के लिए |
कुछ दिन ये तरीका ठीक चला पर एक दिन बड़े बेटे ने कहा मैं अगले सप्ताह ननिहाल जाऊंगा और दस दिन बाद वापिस आऊंगा इसलिए दस दिन अंगूठी मेरे पास ही रहेगी | इस बात को लेकर फिर लड़ाई हो गई|
किशन काका का फैसला
किशन काका के लिए अंगूठी घर में लड़ाई का कारण बन गई | अगले दिन तीनों लड़के खेत में काम करने गये , और आज अंगूठी पहनने की बारी किशन काका की थी, वो शहर से सामान लाने के लिए निकल गये और शहर के थाने पहुंचे |
किशन काका ने सीधा थानेदार जी के सामने अपने हाथ से अंगूठी निकाल कर रख दी और सारी बात बताई| इतने में एक पति-पत्नी थाने में आये और अपनी कीमती अंगूठी खोने की रिपोर्ट दी | थानेदार ने रिपोर्ट देख कर अंगूठी के बारे में कुछ पूछतास की और फिर किशन काका लेकर आये वो अंगूठी दिखाई |
अंगूठी देखते ही दोनों बहुत ही खुश हुए और पूछा कि आखिर ये थाने में कौन दे गया है? हम उस से मिलना चाहते है|
थानेदार जी ने सामने ही खड़े किशन काका की ओर इशारा करते हुए कहा “ये जो आपके सामने गरीब किसान खड़े है यही लेकर आये है आपकी अंगूठी”|
दरअसल वो पति-पत्नी उस शहर के बड़े उद्योगपति थे, थोड़े दिन पहले वे जंगल की परिक्रमा करने गए उस दौरान उनकी अंगूठी रास्ते में कहीं गिर गई थी|
उन्होंने अपनी हीरे की बहुमूल्य अंगूठी ले ली और किशन काका को अपने साथ घर चलने को कहा |
किशन काका उनकी चमचमाती गाड़ी में बैठ कर जब उनके घर पहुंचे तो उनका बड़ा सा घर देखकर दंग रह गये | किशन काका की अच्छी सेवा की और फिर उनको उस अंगूठी की आधी कीमत उपहार स्वरुप भेट की , किशन काका ने हालाँकि बहुत मना किया पर उन दोनों ने आग्रह किया कि अगर आप ये थाने नहीं लाते तो ये आपकी ही होती पर आपने ईमानदारी का परिचय दिया इस कारण ये उसकी आधी ही कीमत है आप इसे रख ले |
लालच का अंत, एकता की शुरुआत
बहुत अनुनय विनय के बाद किशन काका ने वो रूपये अपनी जेब में रख लिए और फिर वहां अपने घर के लिए चल पड़े |
अब वे बाजार में आए तो उनको ख्याल आया कि घर जाते ही मेरे पुत्र तो मुझे अंगूठी के लिए लड़ेंगे तो क्या जवाब दूंगा, ऐसा सोचते हुए वे एक सुनार की दुकान पर पहुंचे और तीन सोने की अंगूठी की किमत पूछी | दुकानदार ने किमत बताई और किशन काका ने अपनी जेब में रखे रूपये गिने तो वो उस किमत से अधिक ही थे |
किशन काका ने तीन सोने की अंगूठी लेकर उसकी किमत चूका कर घर आ गये |
सुबह छोटे पुत्र की अंगूठी पहनने की बारी थी पर बड़े ने पहले ही कहा था वो ननिहाल जायेगा तो अंगूठी पहन कर जाएगा, सुबह होने पर दोनों लड़ने लग गये और किशन काका से अंगूठी मांगने लगे |
किशन काका ने जब लड़ते देखा तो कहा कि तीनों मेरे पास आवो, आज तुम्हें मैं अपनी अपनी अंगूठी देता हूँ पर ये प्रतिज्ञा करो कि आज से हम ईमानदारी से कार्य करेंगे और कभी आपस में लड़ेंगे नहीं |
तीनों पुत्र ख़ुशी और आश्चर्य से पिता के सामने खड़े हो गये , किशन काका ने अपनी जेब में से तीन नई अंगुठियां निकाली और तीनों की एक एक दे दी , नई और सोने की अंगूठी पाकर वे खुश हो गये |
फिर किशन काका ने सारी बात तीनों को सुना दी , तीनों को लगा कि हमारी लड़ाई की वजह से पिता ने सही निर्णय लिया और उनका ईनाम भी मिला |
तीनों पुत्रों ने पिता के चरणों में अपना सिर झुका दिया और वचन दिया कि वो आज से कभी भी आपस में लड़ेंगे नहीं और जीवन में हमेशा ईमानदारी से कार्य करेंगे |
किशन काका मन ही मन सोच रहे थे अगर कल थाने में जाकर अंगूठी जमा नहीं करता तो अभी शायद दृश्य कुछ और ही होता |
कहानी की सीख (Moral of the Story)
सीख: ईमानदारी का फल हमेशा मीठा होता है। लालच और आपस की लड़ाई से केवल नुकसान होता है, जबकि सच्चाई और सूझबूझ से कठिन से कठिन परिस्थिति को भी परिवार की भलाई में बदला जा सकता है।
सोचिए और बताइए:
- अगर किशन काका अंगूठी थाने में जमा नहीं करते तो आगे क्या हो सकता था?
- क्या तीनों भाइयों का झगड़ा कभी खत्म होता?
- तीन अंगूठियाँ खरीदने के बाद जो पैसे बचे, उनका उपयोग किशन काका ने किस अच्छे काम में किया होगा?
- अगर आपको रास्ते में कोई कीमती वस्तु मिले तो आप क्या करेंगे?
- अगर किशन काका की जगह आप होते, तो उस हीरे की अंगूठी का क्या करते?
- क्या आपको लगता है कि किशन काका के बेटों को अपनी गलती का अहसास सही समय पर हो गया था? अपने विचार कमेंट्स में जरूर बताएं!