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दुष्ट संगति कभी न कीजे
जब कबूतर के बच्चे ने पिता की बात ठुकराकर गिरगिट से बढ़ाया दोस्ती का हाथ, जानिए कैसे एक ज़हरीली दोस्ती ने पूरे समाज को सुलगती आग में झोंका
(Dusht Sangati Kabhi Na Kije)

भूमिका (Introduction)

बचपन से हमें सिखाया जाता है कि जैसी संगति होती है, वैसा ही हमारा भविष्य बनता है। एक गलत दोस्त आपके हंसते-खेलते जीवन को नर्क बना सकता है। ‘दुष्ट संगति कभी न कीजे’ की यह प्राचीन और सीख देने वाली लोककथा एक ऐसे ही नादान कबूतर की कहानी है, जिसने अपने पिता की अनुभवी चेतावनी को नजरअंदाज कर एक धोखेबाज़ जीव से यारी बढ़ाई और अंततः अपने पूरे कबीले को विनाश के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया।

मुख्य कंटेंट/कहानी (Main Content Structure)

चंचल कबूतर और गिरगिट की अजीब दोस्ती

किसी नदी के सुरम्य किनारे पर बरगद का एक बहुत ही विशाल और घना पेड़ था। उस पेड़ की सुरक्षित खोहों में बहुत से कबूतर मिल-जुलकर रहा करते थे। उन सभी कबूतरों का एक बुद्धिमान और अनुभवी सरदार था। उस सरदार का एक बेटा था, जो स्वभाव से बहुत ही ज्यादा चंचल, नटखट और शैतान था।

एक दिन उस चंचल कबूतर के बच्चे की दोस्ती एक गिरगिट से हो गई। रोज़ सुबह जैसे ही कबीले के सारे कबूतर भोजन की तलाश में बाहर निकलते, सरदार का बेटा उड़कर सीधे उस गिरगिट के पास जा पहुँचता। वह दिनभर गिरगिट के साथ जंगल में इधर-उधर घूमता, मौज-मस्ती करता और शाम ढलते ही वापस बरगद के पेड़ पर अपने घर लौट आता था।

शुरुआत में कबूतरों के सरदार को इस बात की भनक नहीं थी। लेकिन एक दिन जब उसे किसी तरह अपने बेटे की इस नई दोस्ती का पता चला, तो वह बहुत नाराज और चिंतित हो उठा। उसने तुरंत अपने बेटे को पास बुलाया और डांटते हुए समझाया, बेटा! मैंने सुना है कि तुम किसी गिरगिट के साथ दिन-रात घूमते हो। गिरगिट की जाति बहुत मतलबी और नीच होती है, उनका कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। हो सकता है कि किसी दिन उसके कारण हमारा पूरा कबूतर-समाज भारी संकट में पड़ जाए। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम तुरंत उससे नाता तोड़ लो।” मगर युवा खून और चंचलता के कारण बेटे पर अपने पिता की इस अमूल्य सीख का कोई असर नहीं हुआ और वह लुक-छिपे लगातार उस गिरगिट से मिलता रहा।

गले मिलने का शौक और गिरगिट की खौफनाक साज़िश

धीरे-धीरे दिन बीतते गए और समय के साथ कबूतर का बच्चा बढ़कर एक हट्टा-कट्टा बड़ा कबूतर बन गया, लेकिन गिरगिट का आकार कुदरती रूप से वैसा का वैसा ही छोटा रहा। अब जब भी कबूतर अपने दोस्त गिरगिट से मिलने जाता, तो वह अपनी खुशी ज़ाहिर करने के लिए बड़े चाव से गिरगिट को कसकर गले लगा लेता था। कबूतर के भारी-भरकम शरीर के बोझ और दबाव के कारण जब वह गले मिलता, तो गिरगिट की जान पर बन आती थी और उसे बहुत तेज दर्द होता था।

गिरगिट ने एक दिन तंग आकर कबूतर से कहा भी, “मित्र! हम दोनों तो मन से सच्चे दोस्त हैं ही, फिर इस तरह रोज़-रोज़ गले मिलने से क्या फायदा?” पर कबूतर अपनी धुन का पक्का और मस्तमौला था; उसे गले मिलने में एक अनोखा आनंद आता था, इसलिए उसने गिरगिट की बात अनसुनी कर दी और गले मिलना जारी रखा। गिरगिट मन मारकर रह जाता, लेकिन उस रोज-रोज के दबाव के कारण वह दिन-प्रतिदिन शारीरिक रूप से कमजोर होने लगा। अंततः इस रोज के दर्द और कष्ट से परमानेंट छुटकारा पाने के लिए गिरगिट के दुष्ट दिमाग ने एक बेहद भयानक योजना बनाई |

एक दोपहर, जंगल में एक क्रूर शिकारी अपने खूंखार शिकारी कुत्तों को लेकर पक्षियों के शिकार की तलाश में भटक रहा था। ऊंचे स्थान पर बैठे गिरगिट ने जैसे ही शिकारी को देखा, वह खुशी से फूला न समाया। उसने मन ही मन सोचा, अब आएगा असली मजा! रोज़ मुझे गले मिलकर दबाता है न? अगर आज मैंने इसके पूरे खानदान को एक-एक करके न मरवा दिया, तो मेरा नाम भी गिरगिट नहीं!” वह तेजी से भागकर शिकारी के पास गया और बोला, “क्यों भैया, जंगल में कबूतर ढूंढ रहे हो क्या? चलो मेरे साथ, मैं तुम्हें एक ही जगह पर सैकड़ों कबूतरों का तगड़ा शिकार दिलाता हूँ।”

सुलगता बरगद का पेड़ और सरदार की मास्टरस्ट्रोक चाल

शिकारी तो कबूतरों की ही तलाश में था, वह बेहद खुश हो गया। गिरगिट उसे गाइड करते हुए सीधे उसी विशाल बरगद के पेड़ के पास ले आया जहाँ पूरा कबूतर कबीला सो रहा था, और इशारे से उनका ठिकाना दिखा दिया। शिकारी की बांछें खिल गईं। उसने अपने शिकारी कुत्तों को पेड़ के नीचे पहरेदारी पर बैठाया और खुद पास के खेतों से सूखी घास और पुआल का भारी ढेर बटोर लाया। दुष्ट गिरगिट इस खूनी तमाशे को देखने के लिए दूर एक ऊंचे पत्थर पर जाकर छिप गया।

शिकारी ने बरगद के पेड़ की जड़ों के पास पुआल रखकर उसमें आग लगा दी। देखते ही देखते भयंकर और जहरीला धुआं उठने लगा। जब वह दमघोंटू धुआं कबूतरों के रहने की खोहों और घोंसलों में घुसने लगा, तो सारे कबूतर डर के मारे फड़फड़ाने लगे। धुएं के कारण उनका दम घुट रहा था और नीचे खूंखार कुत्ते और आग की लपटें थीं, जिससे बाहर निकलना मौत को बुलावा देना था।

ठीक उसी समय, कबूतरों का बुद्धिमान सरदार कहीं बाहर से उड़ता हुआ वहाँ पहुँचा। अपने घर को धुएं के गुब्बार में घिरा देखकर वह सन्न रह गया। तभी उसकी पैनी नजर दूर छिपे और मुस्कुराते हुए गिरगिट पर पड़ी। सरदार को यह समझते एक पल भी देर नहीं लगी कि यह घिनौनी करतूत इसी दुष्ट गिरगिट की है। उसने तय किया कि चाहे जो हो जाए, उसे अपने साथियों के प्राण बचाने ही होंगे।

सरदार ने अपनी जान की, आग की लपटों की और जहरीले धुएं की परवाह नहीं की और तेजी से सीधे सुलगती हुई खोह के भीतर घुस गया। इस खतरनाक प्रयास में उसके सुंदर पंख भी काफी जल गए, लेकिन उसने उस दर्द को मुस्कुराकर सहा। वह भीतर पहुँचकर पूरी ताकत से चिल्लाया, भाइयों! घबराओ मत और जल्दी से मेरे पीछे आओ। मैंने इस विपत्ति के लिए पहले से ही पेड़ के पीछे की तरफ बाहर निकलने का एक गुप्त रास्ता बना रखा है, वहाँ से निकलो!”

बाकी कबूतरों को उस खुफिया रास्ते के बारे में पता नहीं था। सरदार ने फुर्ती से सबको गाइड किया और कुछ ही पलों में सारा का सारा खोह सुरक्षित तरीके से खाली हो गया और सारे कबूतर आसमान में उड़ गए। नीचे खड़ा शिकारी और वह साज़िशकर्ता गिरगिट बस हाथ मलते रह गए।

मुख्य सीख/निष्कर्ष (Moral / Key Takeaway)

एक सुरक्षित स्थान पर जाकर कबूतरों ने नया आशियाना बनाया। तब कुछ युवा कबूतरों ने सरदार से कहा, “अगर आपने वह गुप्त रास्ता न बनाया होता, तो आज हम सब राख हो जाते।” तब सरदार हंसकर अपने बेटे की ओर देखते हुए बोला, मुझे पहले से पता था कि गिरगिट अपनी फितरत के अनुसार एक न एक दिन गद्दारी ज़रूर करेगा। दुष्ट लोग कभी अपना विनाशकारी स्वभाव नहीं बदलते, इसलिए उनके साथ की गई मित्रता कभी फलदायी नहीं हो सकती।” यह सुनकर सरदार के चंचल बेटे की आँखें शर्म से झुक गईं और उसे कुसंगति का सबसे बड़ा सबक मिल चुका था।

पाठकों के लिए सवाल (Engagement Questions)

  1. दोस्तों, क्या आपको लगता है कि अगर कबूतर का बच्चा अपने पिता की बात मान लेता, तो पूरे समाज की जान दांव पर लगती?
  2. क्या आपके आस-पास भी कोई ऐसा ‘गिरगिट’ जैसा दोस्त है जो सामने कुछ और और पीठ पीछे कुछ और होता है? अपने अनुभव कमेंट में शेयर करें!

FAQ Schema (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

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