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शीर्षक
अहंकार का सिर नीचा:
जानिए क्यों एक बनिया, जंगलों में घोर तपस्या करने वाले ऋषि से बड़ा तपस्वी बन गया!

  • शीर्षक 1: अहंकार का सिर नीचा: जब एक साधारण दुकानदार ने तोड़ा महान तपस्वी का घमंड
  • शीर्षक 2: तपस्वी जाजलि और वैश्य तुलाधर की कथा: जानिए क्या है सच्चा धर्म और तपस्या?
  • शीर्षक 3: पौराणिक कहानी: घमंड की उम्र छोटी होती है, कर्म और नम्रता ही असली सिद्धि है

अहंकार का सिर नीचा
हम सब ने बचपन में अपने दादा-दादी , नाना-नानी या फिर किसी सत्संग में ऐसी कथायें सुनी जरुरु होगी पर कभी उस कथा पर हम मनन नहीं करते , आज मेरा आग्रह है आपसे , ऐसी कथाये अपने जीवन पर लागू कर के देखे , अपने को एक पात्र मान कर समझे फिर देखें , कैसे ये हमें परिष्कार करती है ?

अहंकार का सिर नीचा कहानी (Ahankar ka sir neecha kahani)

अक्सर लोग समझते हैं कि घर-बार छोड़कर, जंगलों में जाकर भूखे-प्यासे रहना और सालों तक समाधि लगाना ही सबसे बड़ी साधना है। लेकिन हमारे पुराणों में दर्ज कथाएं बताती हैं कि अगर मन में अहंकार हो, तो संसार की सबसे बड़ी तपस्या भी मिट्टी के समान हो जाती है। आइए जानते हैं ऋषि जाजलि और काशी के एक ईमानदार व्यापारी तुलाधर की यह प्रेरक कहानी।

प्राचीन समय में जाजलि नाम के एक महान तपस्वी थे । उन्होंने एक भयानक जंगल में, समुद्र के किनारे अपनी तपोभूमि बनाई थी, जहाँ कोई दूसरा मनुष्य भूलकर भी नहीं आता था । जाजलि ने सर्दी, गर्मी या बरसात की परवाह किए बिना खुले आकाश के नीचे सालों तक कठिन समाधि लगाई । उनका एक ही संकल्प था—अपने शरीर को तपस्या की आग में तपाकर एकदम निश्चल और जड़ बना देना । लेकिन जैसे-जैसे उनकी तपस्या सफल होने लगी, उनके भीतर एक सूक्ष्म शत्रु ने जन्म ले लिया, और वह शत्रु था—अहंकार ।

एक बार ऋषि जाजलि एक ही स्थान पर खड़े होकर घोर तपस्या कर रहे थे । उनका शरीर किसी सूखे पेड़ की तरह स्थिर हो चुका था और उनकी जटाएं चारों तरफ फैल गई थीं । उनकी जटाओं को पेड़ की शाखाएं समझकर एक चिड़िया ने वहाँ अपना घोंसला बना लिया और अंडे दे दिए । जाजलि को इस बात का पता चला, लेकिन वे जानबूझकर हिले-डुले नहीं ताकि पक्षी उड़ न जाएं । अंडों से बच्चे निकले और बड़े होकर उड़ गए ।

इस घटना ने जाजलि के अहंकार को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया । उन्हें लगने लगा कि संसार में उनके जैसा दयालु और कठोर तपस्वी कोई दूसरा पैदा ही नहीं हुआ । जब पक्षी एक महीने तक लौटकर नहीं आए, तब वे वहाँ से हटे और नदी में स्नान किया । पूजा करते समय उन्हें अपने भीतर एक अनोखा तेज महसूस हुआ । उन्होंने गर्व से सूर्य देव की तरफ देखकर कहा—”हे सूर्य देवता! अब तुम्हें अपने तेज पर घमंड करने की जरूरत नहीं है, मेरा तेज देखो!”

अपने तेज के नशे में चूर जाजलि जब इंसानी समाज से मिलने के लिए आगे बढ़े, तभी अचानक आसमान से एक गूंजती हुई आकाशवाणी सुनाई दी । आकाशवाणी ने कहा—”हे जाजलि! तुम्हारी तपस्या निसंदेह कठोर है, लेकिन इस पर घमंड करना व्यर्थ है । तुम्हारी यह तपस्या काशी के एक साधारण वैश्य (दुकानदार) तुलाधर के तराजू के पलड़े (पासंग) के बराबर भी नहीं है! वह कभी अपनी साधना का ढोंग नहीं रचता और तुम यहाँ डींगें मार रहे हो ।”

यह सुनते ही जाजलि का अहंकार तिलमिला उठा और उनके मन में तुलाधर के प्रति ईर्ष्या की आग सुलगने लगी । उन्होंने सोचा—”एक मामूली बनिया मुझसे श्रेष्ठ कैसे हो सकता है? मुझे खुद जाकर देखना होगा।” और वे काशी की ओर चल पड़े ।

कई दिनों की यात्रा के बाद जाजलि काशी पहुँचे और तुलाधर की दुकान पर जा खड़े हुए । उन्होंने देखा कि एक बेहद साधारण सा आदमी तराजू थामे ग्राहकों को सामान बेच रहा है । जाजलि ने मन ही मन सोचा—”कहाँ मैं वर्षों तक भूखा-प्यासा रहकर तप करने वाला महात्मा, और कहाँ यह नफे-नुकसान के चक्कर में दिनभर सौदा बेचने वाला बनिया! आकाशवाणी ने इसकी तुलना मुझसे कैसे कर दी?”

तुलाधर ने ऋषि को देखा, लेकिन ग्राहकों की भीड़ के कारण वह तुरंत बात नहीं कर पाया । जब सारे ग्राहक चले गए, तो तुलाधर अपनी गद्दी से नीचे उतरा, जाजलि के चरण छुए और नम्रता से बोला —”महाराज! आपकी यात्रा कष्टमयी रही । मैं जानता हूँ कि आपकी जटाओं में पक्षियों ने घोंसले बनाए थे । लेकिन महाराज, आपकी वह सारी घोर तपस्या तब तक बेकार है, जब तक आपके भीतर एक चोर छुपा हुआ है ।”

जाजलि ने चौंककर पूछा—”कौन सा चोर?” तुलाधर ने मुस्कुराकर कहा—”आपका अहंकार! जो भीतर बैठकर आपकी सारी साधना को धीरे-धीरे खा रहा है ।”

 तुलाधर की इस चमत्कारी बात को सुनते ही जाजलि का सिर शर्म से झुक गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे । उनके आँसुओं के साथ उनका बरसों का घमंड भी बह गया । उन्होंने हाथ जोड़कर तुलाधर से पूछा—”संसार के चक्र में रहते हुए भी तुमने यह सिद्धि कैसे पाई? मुझे भी इसका रहस्य बताओ।”

तुलाधर ने बिना किसी अभिमान के उत्तर दिया—”हे ऋषिवर! जिस काम से कभी किसी की हानि न हो, किसी के प्रति मन में कड़वाहट या द्रोह न आए, वही सच्चा धर्म है । मैं अपनी दुकान पर कभी किसी के साथ छल-कपट या धोखा नहीं करता । न मैं किसी का विरोध करता हूँ, न किसी से अत्यधिक उम्मीद रखता हूँ । मैं खुद को कभी बड़ा साधक नहीं मानता और सबके साथ समान व्यवहार करता हूँ । अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाना ही मेरी पूजा और तपस्या है । ईश्वर को पाने के लिए जंगल जाने की जरूरत नहीं, संसार में रहकर अच्छा आचरण करना ही सबसे बड़ी धार्मिकता है ।”

अहंकार का सिर नीचा कहानी (Ahankar ka sir neecha kahani)

तुलाधर के इन वचनों ने जाजलि का सारा अंधकार दूर कर दिया । उनके मन की जलन और अहंकार शांत हो गया । उन्हें महसूस हुआ कि आज वर्षों बाद उन्हें अपनी तपस्या का असली फल मिला है, और वे शांत मन से वापस अपनी तपोभूमि लौट गए ।

Moral of the Story (कहानी की सीख)

सीख: अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, जो उसके द्वारा किए गए सभी अच्छे कर्मों और पुण्यों को नष्ट कर देता है । सच्चा तपस्वी वह नहीं है जो संसार छोड़ दे, बल्कि वह है जो संसार में रहकर भी ईमानदारी, नम्रता और निश्छल भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करे ।

Engagement Questions (पाठकों के लिए सवाल)

  1. आपके विचार से क्या आज के आधुनिक युग में तुलाधर की तरह ‘बिना किसी को धोखा दिए’ पूरी ईमानदारी से व्यापार करना संभव है? अपनी राय कमेंट में साझा करें।
  2. क्या आपको भी कभी अपने किसी काम या सफलता पर ऐसा अहंकार हुआ है जिसने बाद में आपका नुकसान किया हो? हमसे अपना अनुभव जरूर शेयर करें।