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शीर्षक: ईर्ष्या की आग: जब दूसरे को गिराने की चाह में खुद बर्बाद हुआ राजा

भूमिका

आइये मैं आपको मेरे बचपन में सुनी हुई एक ऐसी कहानी को आप तक पहुँचाना चाहता हूँ , शायद आपने पहले सुन भी रखी हो या पहली बार सुन रहे हो , यह कहानी कालजयी है अतः ये जिस समय घटित हुई से लेकर अब तक भी प्रासंगिक ही है , तो पढ़े और फिर अपने जान-पहचान में भी सुनाये |
 प्राचीन काल से ही हमारे पुराणों और कथाओं में मानवीय भावनाओं को बहुत गहराई से समझाया गया है। काम, क्रोध, लोभ के साथ-साथ ‘ईर्ष्या’ (जलन) को भी इंसान का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। आज हम आपको दक्षिण भारत के एक ऐसे ही प्रतापी राजा की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसकी ईर्ष्या ने उसका सब कुछ खाक कर दिया।

धर्मात्मा राजा वृषदर्भ की अनोखी प्रतिज्ञा

पुराने समय में दक्षिण भारत में राजा वृषदर्भ का शासन था। वे बेहद धर्मात्मा, दानी और प्रजापालक राजा थे। प्रजा की सुख-समृद्धि के लिए वे लगातार यज्ञ और जनकल्याण के कार्य करते रहते थे। राजा वृषदर्भ की एक खास प्रतिज्ञा थी—उन्होंने घोषणा कर रखी थी कि उनके दरबार में जो भी ब्राह्मण या जरूरतमंद आए, वह केवल सोना और चांदी ही दान में मांगे। यदि किसी ने इसके अलावा कुछ और मांगा, तो उसे शारीरिक दंड दिया जाएगा। अपनी इसी उदारता और प्रजा-प्रेम के कारण राजा वृषदर्भ का यश चारों दिशाओं में फैल रहा था।

राजा सेदुक की ईर्ष्या और नकल

वृषदर्भ की बढ़ती लोकप्रियता और मान-सम्मान को देखकर पड़ोसी राज्य का राजा ‘सेदुक’ मन ही मन बहुत जलता था। वह हमेशा इस ताक में रहता था कि कैसे राजा वृषदर्भ को नीचा दिखाया जाए। सेदुक ने वृषदर्भ की नकल करते हुए बड़े-बड़े दान-पुण्य और यज्ञ करने शुरू कर दिए। लेकिन कहते हैं न कि ‘नकल तो सिर्फ नकल ही होती है’। लाख कोशिशों के बाद भी समझदार लोगों पर सेदुक के इस दिखावे का कोई असर नहीं हुआ और उसे वह सम्मान नहीं मिला जो वृषदर्भ को प्राप्त था। इससे सेदुक के मन की जलन और बढ़ गई।

ब्राह्मण बैरवानस का आगमन और सेदुक की चाल

एक बार राजा सेदुक ने एक बड़ा यज्ञ किया और अपना सब कुछ दान कर दिया। तभी उनके पास ‘बैरवानस’ नाम के एक ब्राह्मण आए। ब्राह्मण ने कहा, “हे राजन! मुझे अपने गुरु को दक्षिणा में एक हजार सफेद घोड़े देने हैं। आपकी दानवीरता सुनकर आया हूँ, कृपया मेरी मदद करें।” अब राजा सेदुक धर्मसंकट में पड़ गया, क्योंकि वह यज्ञ में अपना सब कुछ पहले ही लुटा चुका था। उसने ब्राह्मण से कुछ दिन इंतजार करने को कहा, लेकिन ब्राह्मण ने मना कर दिया।

तभी सेदुक के कुटिल दिमाग में एक चाल आई। उसने सोचा कि क्यों न इस ब्राह्मण को राजा वृषदर्भ के पास भेज दिया जाए। वृषदर्भ तो केवल सोना-चांदी दान करता है, जब ब्राह्मण उससे घोड़े मांगेगा, तो वह दे नहीं पाएगा। ऐसे में ब्राह्मण गुस्से में आकर वृषदर्भ को शाप दे देगा और मेरा रास्ता साफ हो जाएगा। सेदुक ने ब्राह्मण से कहा, “आप सीधे राजा वृषदर्भ के पास जाइए, वह आपकी इच्छा तुरंत पूरी करेंगे। बस ध्यान रहे, अपनी मांग सीधे राजा के सामने ही रखिएगा।”

राजा वृषदर्भ का क्रोध और प्रतिज्ञा की रक्षा

 ब्राह्मण बैरवानस राजा वृषदर्भ की राजधानी पहुँचे। राजा के कर्मचारियों के पूछने पर भी उन्होंने अपनी मांग नहीं बताई और सीधे राजा के सामने उपस्थित हुए। ब्राह्मण ने राजा वृषदर्भ से कहा, “महाराज! मुझे गुरु-दक्षिणा के लिए एक हजार सफेद घोड़े चाहिए।”

यह सुनते ही राजा वृषदर्भ क्रोधित हो उठे। राजा की प्रतिज्ञा थी कि उनके यहाँ सिर्फ सोना-चांदी ही मांगा जा सकता है। राजा को लगा कि उनकी प्रतिज्ञा जानते हुए भी ब्राह्मण उनका अपमान कर रहा है। नियम के अनुसार राजा ने खुद कोड़ा उठाया और ब्राह्मण को दंड देना शुरू कर दिया। दस-बीस कोड़े लगते ही ब्राह्मण दर्द से कराहते हुए जमीन पर गिर पड़ा।

सत्य का खुलासा और शाप का मोड़

होश आने पर क्रोधित ब्राह्मण ने राजा को शाप देने के लिए हाथ उठाया और कहा, “नीच राजा! दान मांगने पर तूने मुझे कोड़े मारे हैं, मैं तुझे अभी नष्ट होने का शाप देता हूँ।” राजा वृषदर्भ ने घबराकर लेकिन विनम्रता से कहा, “हे देव! शांत होइए। जरा सोचिए, मेरी प्रतिज्ञा जानते हुए भी आपने मुझसे घोड़ों का दान मांगकर मेरी प्रतिज्ञा तोड़ने की कोशिश की। क्या अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहने वाले व्यक्ति को शाप देना उचित है?”

राजा की यह तर्कसंगत बात सुनते ही ब्राह्मण बैरवानस की आँखें खुल गईं। उन्हें तुरंत राजा सेदुक की चालाकी समझ में आ गई कि कैसे उन्हें मोहरा बनाया गया था। ब्राह्मण ने कहा, “राजन! आप सत्य कह रहे हैं। मैं राजा सेदुक के बहकावे में आ गया था।”

क्रोधित होकर ब्राह्मण ने राजा सेदुक को शाप दे दिया—”जिस राजा सेदुक की ईर्ष्या के कारण मुझे आज यह शारीरिक कष्ट भोगना पड़ा है, उसके सारे पुण्य नष्ट हो जाएंगे और उसका राज-पाट भी छिन जाएगा।”

कहानी का अंत

इसके बाद राजा वृषदर्भ ने ब्राह्मण बैरवानस को आदरपूर्वक अपार सोना-चांदी दान में दिया। राजा के कर्मचारियों ने उस धन से एक हजार सफेद घोड़े खरीदकर ब्राह्मण को सौंप दिए। ब्राह्मण खुशी-खुशी आशीर्वाद देकर विदा हुआ। कुछ समय बाद, राजा वृषदर्भ ने सेदुक के राज्य पर आक्रमण कर उसे जीत लिया और सेदुक का पतन हो गया।

Moral of the Story (कहानी की सीख)

सीख: ईर्ष्या हमेशा खुद के विनाश का कारण बनती है। दूसरों की लकीर छोटी करने के चक्कर में इंसान अपने खुद के पुण्य और विवेक को खो बैठता है। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा (स्वस्थ मुकाबला) प्रगति की राह दिखाती है, लेकिन किसी से जलन रखना अंततः खुद को ही नष्ट कर देता है।

Engagement Questions (पाठकों के लिए सवाल)

क्या आपको भी लगता है कि राजा सेदुक की तरह आज के समय में भी लोग दूसरों की तरक्की देखकर दिखावे की जिंदगी जीते हैं? अपने विचार कमेंट में बताएं।

  1. राजा वृषदर्भ का अपनी प्रतिज्ञा पर अड़े रहना सही था या उन्हें ब्राह्मण की स्थिति देखकर तुरंत नियम बदल देना चाहिए था? आपकी इस पर क्या राय है?
  2. राजा वृषदर्भ का अपनी प्रतिज्ञा पर अड़े रहना सही था या उन्हें ब्राह्मण की स्थिति देखकर तुरंत नियम बदल देना चाहिए था? आपकी इस पर क्या राय है?

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