सबके दुःख हरने वाला मंत्र: श्री रामानुजाचार्य की अद्भुत करुणा कथा
लोककल्याण के लिए गुरु का आदेश तोड़ने वाले संत
“क्या आप किसी अजनबी के सुख के लिए स्वयं नरक जाने को तैयार होंगे? श्री रामानुजाचार्य ने ऐसा करने का साहस दिखाया था।”
“गुरु ने कहा— यह मंत्र किसी को मत सुनाना, वरना नरक मिलेगा। लेकिन रामानुजाचार्य ने पूरे गाँव को मंत्र सुना दिया। आखिर क्यों?”
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श्री रामानुजाचार्य जी के गुरु ने उनसे कहा – “रामानुज, इस मन्त्र को जोर-जोर से ना बोलो , तुम्हे पाप लगेगा”
रामानुज ने उत्तर दिया “ गुरूजी आप ने ही तो कहा था कि इस मन्त्र को जो सुनाता है उसके दुख दूर हो जाते है , इसलिए मैं जोर जोर से बोल रहा हूँ ताकि कोई सुने तो उसके दुख दूर हो जाये”|
श्री रामानुजाचार्य के विद्यार्थी जीवन का प्रसंग है रामानुज के गुरु ने उन्हें एक विशेष मन्त्र “ॐ नमो: नारायणाय” का जाप करने की आज्ञा दी और इसे सिखाते हुवा कहा कि जिसके भी कान में इस मन्त्र के अक्षर पड़ेंगे, वह सभी तरह के दुखों से छूट जायेगा | पर सावधान ! यह मन्त्र गुप्त है , इसके अक्षर ऐसे व्यक्ति के कान में ना पड़े जो इसके योग्य ना हो , यदि ऐसा हुवा तो , तो सुनाने वाले को बड़ा दुःख भोगना पड़ेगा |
श्री रामानुजाचार्य अपने गुरु की आज्ञा के अनुसार मन ही मन उस मन्त्र का जाप करते रहते , पर श्री रामानुज जब भी किसीओ देखते, तो उसे दुखी ही पाते, किसी को बेटा-बेटी का दुःख , किसी को धन का दुःख, किसी को तन का दुःख , किसी को मन का दुःख |
श्रीरामानुज लोगों के दुखों को देख कर मन ही मन बहुत दुखी हुवा करते थे | वे सोचते रहते थे कि क्या कोई ऐसा उपाय नहीं जिससे लोगों के दुःख को दूर किया जाये , उन्हें सुखी बनाया जा सके?
अखिर सोचते सोचते उनको अपने गुरु मंत्र “ॐ नमो: नारायणाय” पर ध्यान गया , उन्हें याद आया कि गुरूजी ने मंत्र देते समय कहा भी था कि जिसके भी कान में मंत्र के अक्षर पड़ेंगे वह सभी तरह के दुखों से छूट जायेगा |
पर उन्हें ये भी याद आया कि गुरु ने कहा था कि योग्य व्यक्ति के कान में आवाज पड़ी तो सुनाने वाले को बड़ा दुःख मिलेगा |
रामानुज ने मन में सोचा कि अगर दुःख मिलेगा तो भोग लेंगे पर बहुत सारे दुखी लोगों के दुःख तो दूर होंगे , रामानुज ने मन ही मन निश्चय किया कि गुरु की आज्ञा भंग कर अवश्य ही सबको ॐ नमो: नारायणाय का मंत्र जोर जोर से पढ़ कर सुनायेंगे |
अगली सुबह लोग अपने कार्यों के लिए रास्तों से गुजरने लगे तो वे कुटिया के छपर के ऊपर जा बैठे और जोर जोर से ॐ नमो: नारायणाय, ॐ नमो: नारायणाय मंत्र का जाप करने लगे |
जिसने भी उनको सुबह ऐसे जोर जोर से ॐ नमो: नारायणाय-ॐ नमो: नारायणाय मंत्र का जाप करते सुना , सब ये ही समझे कि रामानुज का दिमाग काम नहीं कर रहा है वे पागल हो गये है|
लोगों को कौन समझाए कि उनका दिमाग ख़राब नहीं है बल्कि वे तो अपनी समझ के अनुसार मनुष्य के कल्याण का कार्य कर रहे है |
कुछ देर बाद जब उनके गुरु को इस बात की भनक लगी तो , तो वे अपनी कुटिया से बहार आये और बाहर आकर देखा तो रामानुज कुटिया के छपर पर जोर जोर से ॐ नमो: नारायणाय ॐ नमो: नारायणाय का जाप कर रहे थे |
गुरु बहुत ही क्रुद्ध हुवे और जोर से रामानुज को पुकारा “रामानुज , तुम नीचे आ जाओ , तुम जोर जोर से इस मंत्र का पाठ मत करो , नीचे आओ”|
रामानुज ने गुरु की बात को अनसुना कर जोर जोर से ॐ नमो: नारायणाय ॐ नमो: नारायणाय का जाप करते रहे |
गुरु ने फिर क्रुध्द होकर कहा , रामानुज तुम मेरी आज्ञा का पालन नहीं कर रहे हो , मैं तुम्हे श्राप दूंगा और तुम नरक के घोर दुःख भोगोगे |
रामानुज ने उत्तर दिया _ “मैं नरक के घोर दुःख सहन कर लूँगा पर गुरूजी, पर ये सभी जो दुखी सुन रहे है इनके दुःख तो दूर हो जायेंगे , क्योंकि आप ही ने कहा था कि यह मंत्र जिसके भी कानों में पड़ेगा , वह सभी तरह के दुखों से छूट जायेगा”|
रामानुज का उत्तर सुन कर उनके गुरु को समझ आया कि श्री रामानुज क्यों जोर जोर से मंत्र का जाप कर रहे थे , गुरु का हृदय प्रेम से भर गया , उनके रोम-रोम में रामानुज के प्रति स्नेह जाग उठा , वे खुद भी छपर पर चढ़ गये और रामानुज को हृदय से लगाते हुवे बोले “सबके सुखों के लिए स्वयं दुःख भोगने वाले रामानुज , मुझे तुम पर गर्व है”|
केवल उनके गुरु हो गर्व नहीं हुवा , आज समस्त भारतियों को उन पर गर्व है , वे भारत के अनमोल रत्न थे |
💡 कहानी की शिक्षा (Moral)
मुख्य शिक्षा
“सच्चा परोपकारी वही है जो दूसरों के सुख और कल्याण के लिए स्वयं कष्ट सहने को तैयार रहे।”
अन्य शिक्षाएँ
- दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझना ही सच्ची मानवता है।
- करुणा और परोपकार किसी भी नियम से श्रेष्ठ हो सकते हैं।
- महान व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज का हित सोचते हैं।
- सच्चा ज्ञान वही है जो सबके कल्याण में उपयोग हो।
- त्याग और सेवा मनुष्य को महान बनाते हैं।