दुःख की पेटी: कैसे धरती पर आए दुःख, बीमारी और मृत्यु की रहस्यमयी कहानी
Dukh ki peti rahasyamayi story
क्या आपने कभी सोचा है कि संसार में दुःख, बीमारी, गरीबी और मृत्यु कैसे आईं? पढ़िए “दुःख की पेटी” की अद्भुत पौराणिक कथा, जिसमें देवताओं की एक योजना ने मानव जीवन को बदल दिया। लेकिन जब सारी आशाएँ खत्म होती दिखीं, तब उसी पेटी से निकली उम्मीद की किरण ने मानवता को जीने का सहारा दिया।
दुःख की पेटी
जानिए कैसे आया धरती पर दुःख
Dukh ki peti rahasyamayi story
बात बहुत पुरानी है कहते है जब इस धरती का जन्म हुवा और इस पर नर जाति का ही आगमन हुवा था अभी नारी जाति का आगमन नहीं हुवा था | इसलिए नर या पुरुष जाति को नारी यानि स्त्री के बारे में कुछ भी ध्यान नहीं था कि ये भी कोई जाति है, इसके रंग-रूप, आकार. सुन्दरता आदि भी पुरुषों से बढ़कर होता है | स्वर्ग के बारे में सुन रखा था कि वहां देवता होते है उनकी देवियाँ भी होती है |
इस शुरुवाती युग में देवताओं का एक मुखिया था , स्वर्ग के साथ धरती पर भी उसका एक छत्र राज चलता था, एक बार उसे एक राक्षस का सामना करना पड़ गया| मुखिया ने इस युद्ध में अपनी हार होती देख धरती के सबसे बुद्धिमान पुरूष से मदद माँगी | यह पुरुष बहुत ही साहसी था , इसने अपने भाई के साथ मिल मुखिया की मदद करी और सौभाग्य से विजय प्राप्त हुई |
युद्ध के बाद पुरुष तो फिर से अपने काम में लग गया , यह बहुत ही कुशल कलाकार था , इसने थोड़े समय में ही धरती के लोगों के लिए तरह –तरह की कलाए खोजी और इनको सिखा दी, जिसमें वास्तुकला(गृह निर्माण) . गणित , ज्योतिष, चिकित्सा, संगीत , चित्र , धातु शोधन आदि |
इन सब कलाओं से भी बढ़ कर एक वस्तु जो धरती पर नहीं थी उसको ले आया वो थी आग, आग को धरती पर लाने से इसका जीवन सुधर गया पर देवता इस खोज से नाराज हो गये | आग को लाया कैसे? इसके पीछे की कहानी है ये |
एक बार देवताओं और पृथ्वी के निवासियों के मध्य वाद-विवाद हो गया , विवाद होने का कारण था कि एक पशु की बलि दी गई , अब बलि के बाद उस पशु के मांस के कौनसे अंग देवताओं को प्रसाद स्वरुप दिए जाये और कौनसे मनुष्यों को दिए जाये |
इस विवाद को सुलझाने के लिए देवताओं ने फिर पुरूषों के मुखिया को निर्णायक बनाया | निर्णायक ने बलि पशु के मांसल भाग को एक थैले में तथा हड्डियों वाले भाग को दुसरे थैले में रख कर अलग किया फिर धरती के इंसानों को और स्वर्ग के देवताओं को बुलाया और अपनी मर्जी से थैला लेंने को कहा , देवताओं ने एक थैला ले लिया |
देवताओं का मुखिया ये जान कर नाराज हुवा कि उसके थैले में अधिकतर हड्डियाँ ही है उसने कहा कि धरती के निकृष्ट लोगों को मांस पकाने के लिए हम आग नहीं देंगे , वे इसे कच्चा ही खाते रहेंगे |
ये बात जान कर पुरूषों का मुखिया भी व्यथित हुवा और अपने पूरे पृथ्वी लोक के लिए ये अपमान की बात थी , ऐसा सोचते हुवे उसने देवताओं के वहां से आग के कुछ अंगारे अपने मुंह में रख कर चुपके से पृथ्वी लोक में आ गया |
पृथ्वी लोक के सब साथियों ने इस साहसिक कार्य के लिए उसकी खूब प्रशंसा करी और अब सब भोजन आग से पकाया जाने लगा | यह बात जब देवताओं को पता चली तो वे सब नाराज हुवे और इंसानों ने यह अपराध किया है इसलिए इंसानों को सज्जा देने की योजना बनाई |
देवनायक ने सभी देवताओं की एक सभा का आयोजन किया और ये सर्वसहमति से ये फैसला किया कि धरती पर संसार की पहली स्त्री जाति को पैदा किया जाये ताकि सब इन्सान जाति को अपने कर्मों की सज्जा मिल सके| इंसानों ने आग को चुराया था , अतः ये काम अग्निदेव को सौंपा गया कि वो धरती पर जाकर एक सुंदर , मनमोहक स्त्री को पैदा करे |
अग्नि देव ने सभी के आदेश अनुसार एक सुंदर ,और मनमोहित करने वाली स्त्री को पैदा किया , सौन्दर्य की देवी ने उसे सुन्दरता दी , वाग्देवी ने उसे मधुर वाणी दी , विद्या की देवी ने उसको सभी विद्याएँ प्रदान करी, और फिर इंसानों के मुखिया के समक्ष प्रस्तुत किया और कहा कि ये देवताओं की तरफ से आपके लिए उपहार है आप इनके मुखिया है आप इससे विवाह कर ले|
पुरूषों का मुखिया दूरदर्शी था उसे देखते ही तुरंत समझ गया कि यह देवताओं की कोई न कोई चाल है इसलिए उसने उस स्त्री की तरफ से नजर फेर ली और लेने से अस्वीकार कर दिया |
पास में खड़ा उसका भाई ये सब देख रहा था , वह उस स्त्री के सोंदर्य पर मोहित हो चूका था उसने अपने भाई से आज्ञा मांगी कि वो इस स्त्री से विवाह करना चाहता है | मुखिया भाई ने स्वीकृति दे दी उसने तुरंत इस उपहार स्वरुप स्त्री को स्वीकार कर लिया और उस से विवाह कर लिया|
स्वर्ग में बैठे देवनायक ने जब इस स्त्री को देखा तो मन ही मन खुश हुवा कि अब मनुष्य इस स्त्री से विवाह करेगा और फिर हमेशा के लिए दुःख के सागर में डूबा रहेगा और फिर इन दुखों के निवारण के लिए हमारी सेवा करता रहेगा|
छोटा भाई विवाह करके ख़ुशी से अपना जीवन बिताने लगा , घर में रोज उत्सव मनाये जा रहे है , नए नए व्यंजन पकाए जा रहे है , सुबह शाम ज्ञान और संगीत की बातें हो रही है, कभी भी किसी बात को लेकर आपस में विवाद नहीं है, घर और आस-पास प्रेम का वातावरण बना हुवा है, कभी-कभार घुमने के लिए नदी-उद्यान की सैर की जा रही है, बहुत ही सुखमय जीवन व्यतित हो रहा है |
थोड़े महीनों बाद देवताओं ने इस विवाहित भाई की रिपोर्ट लेने अपने दूत को भेजा, उसने जाकर कहा कि महाराज वो तो पहले से भी बहुत ज्यादा खुश और आनंदित है, आपका ये उपहार तो उसके लिए वरदान साबित हो गया है |
देवताओं ने फिर चाल चली , अबकी बार उन्होंने फिर अग्निदेव के साथ रेशमी वस्त्र में बंधा एक बॉक्स भेजा |
शाम के समय ये दोनों स्त्री-पुरुष उद्यान में घूम रहे थे , इतने अग्नि देव अपने सेवक के साथ उपस्थित हुवे और उनसे कहा कि ये देवताओं ने आपके लिए दहेज़ भेजा है | इतना कह कर वे बॉक्स वहां रख वापिस आ गये |
ये बात सुनते ही स्त्री तो बहुत ही प्रसन्न हुई और उस संदूक को खोल कर देखने के लिए उतावली होने लगी , पर उसके पति ने कहा , रुको ! पहले मैं बड़े भाई को बुला कर लाता हूँ फिर इसको खोल कर देखेंगे | वह अपने भाई को बुलाने चला गया |
बॉक्स बहुत ही सुंदर और ऊपर से रेशमी वस्त्र बंधा हुवा था , स्त्री उसको देख रही थी कि उसके अंदर से बहुत ही मधुर आवाज आने लगी , “हमें बहार निकालों , हम तुम्हारे साथ रहना चाहती है, हमें मुक्त करो , ” ये सुन कर उस स्त्री से रहा नहीं गया और उसने उस बॉक्स को खोल दिया |
बॉक्स खोलते ही उसमें से बहुत सारी काली-काली बड़ी-बड़ी मक्खियाँ निकली और उस स्त्री को कटाने लगी ,कुछ उसके चिपक गई , कुछ उड़ कर दूर चली गई, स्त्री जोर जोर से चिल्लाने लगी, उसकी आवाज सुन आकर दोनों भाई दौड़े दौड़े आये , देखा तो स्त्री का चेहरा डंक से सूज गया है |
बड़े भाई ने आते ही उस बॉक्स को बंद किया पर उस से पहले सैकड़ों मक्खियाँ उड़ जा चुकी थी ,ये कोई साधारण मक्खियाँ नहीं थी, ये मक्खियों के रूप में थी – दुःख , पीड़ा , दर्द,शोक,बीमारी ,मृत्यु, भूखमरी, गरीबी,महामारी,चिंता, चालाकी आदि | इन सब के डंक से इन्सान को हमेशा कोई न कोई परेशानी होती रही और ये अभी तक इस धरती पर मौजूद है |
धरती के वे प्रथम स्त्री-पुरुष इस दंश की लहर को सहन नहीं कर पाए , वे बैठकर रोने लगे, बड़ी देर तक वे नोंक-झोंक करते रहे , एक दुसरे को कोसते रहे | इस घटना से पहले उनके बीच कभी विवाद नहीं हुवा था | और फिर बात यंहा तक पहुँच गई कि वे एक-दुसरे को देखना तक नहीं चाह रहे थे|
इस की ये सब बातें जब देवनायक को पता चली तो उसका कलेजा गर्व से फूल गया , आखिर देवताओं की योजना सफल हुई |
ये सब घटित हो रहा था पर वो बॉक्स अभी भी वहीँ पड़ा था , एक दिन पति-पत्नी फिर उसी उद्यान आये देखा तो बाक्स में से फिर कुछ वैसी ही आवाजें आ रही है , “मुझे मुक्त करो, मुझे बचाओ, नहीं तो मर जाऊंगा ”
यह सुनकर पति ने पत्नी से कहा “ अब इसे भी मुक्त कर दो, तुमने पहले जितनी बड़ी गलती की है , उससे ज्यादा तो अब क्या होगा ?
इतना कहते ही स्त्री ने उस बॉक्स को खोल दिया , इस बार भी कुछ मक्खियाँ निकली पर इनके नाम थे- दया , आशा , भलाई , कृपा , आदि | वास्तव में ये किसी दयालु देवता ने ही साथ में इनको छिपाकर डाला था ताकि कुछ धरती के लोगों के दुःख दूर हो सके |
इस बार जो ये मक्खियाँ निकली इन्होने पति-पत्नी के जख्मों को चूमा, दर्द से राहत दिलाई , पहले वाली मक्खियों के पीछे भागी , उनको दूर भगाया , और हमेशा मनुष्यों के साथ देती रही |
इस तरह फिर ये मनुष्य जाति को अपने दुखों को दूर करने का एक सहारा मिल गया और वो सुख-दुःख के साथ अपना जीवन व्यतीत करने लगा |
💡 Moral of the Story
मुख्य शिक्षा
“जिज्ञासा और जल्दबाज़ी कई बार समस्याएँ पैदा कर सकती है, लेकिन आशा, दया और भलाई हर दुःख का सामना करने की शक्ति देती हैं।”