राजा ब्रह्मदत्त और नंदीय मृग की प्रेरक कहानी | Raja brahmadatt or Nandeeya mrig ki Moral Story in Hindi
“एक ऐसा हिरण जो मौत के सामने रोया नहीं, बल्कि मुस्कुराया… और एक क्रूर शिकारी राजा को हमेशा के लिए संत बना दिया!”

कोसल देश में एक राजा राज्य करता था , राजा का नाम था ब्रह्मदत | ब्रह्मदत प्रायः वन में शिकार खेलने जाया करता था | वह जब शिकार खेलने जाते थे तो साथ में उसकी बहुत बड़ी सेना भी साथ जाती थी |
राजा तो एक ही जानवर की शिकार किया करता था पर उसके सैनिक बहुत सारे पक्षी और जानवर मार देते थे|
उन दिनों कोसल के पास मृग दाव वन था ,(जिसका आधुनिक नाम सारनाथ है) में एक मृग रहता था उस मृग का नाम था नंदीय था | नंदीय बड़ा ही बुद्धिमान और धर्मात्मा था |
नंदीय ने जब देखा कि वन में बहुत सारे जानवर बिना कारण साथ आई सेना के द्वारा मारे जा रहे , यह जान कर उसे बहुत दुःख भी हुवा |
नंदीय ने अपने मृग साथियों की एक सभा बुलाई और यह तय किया कि राजा के लिए एक मृग प्रति दिन जाया करेगा |
नंदीय ने राजा के सामने अपना प्रस्ताव रखा , राजा ने भी ख़ुशी-ख़ुशी यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया |
बस फिर क्या था बारी बारी से एक मृग रोजाना जब भी राजा शिकार को आता वो उस तरफ चला जाता और राजा उसका तीर से शिकार करके चला जाता था | जिस भी मृग की बारी होती वह उस दिन बहुत ही नर्वस होता , उदास मन से जाता था |
बहुत दिन बाद एक दिन नंदीय की बारी आई | नंदीय राजा के पास आकर खड़ा हो गया, उसके चेहरे पर अपूर्व शांति और प्रसन्नता थी |
राजा को बड़ा ही आश्चर्य हुवा , नंदीय के मुख पर प्रसन्नता और शांति देख कर राजा का धनुष पर लगाया हुवा बाण छोड़ने का विचार चला गया और उसने नंदीय से कहा “ क्यों भाई , तुम इतने प्रसन्न क्यों हो , क्या तुम्हे मृत्यु का कोई भय और दुःख नहीं है ?
नंदीय ने कहा “ दुःख किस लिए , आज तो मेरे भाग्य का सबसे अच्छा दिन है क्योंकि मैं अपनी जाति के कल्याण के लिए अपने प्राण न्योछावर करने जा रहा हूँ |”
नंदीय की ज्ञान भरी बात सुन कर राजा की आँखें खुली की खुली रह गई वो सोचने लगा कि यह एक जानवर होकर भी अपनी जाति के कल्याण के बारे में सोचता है उसके लिए अपने प्राण दे रहा है जबकि मैं मनुष्य हो कर दूसरों के प्राण ले रहा हूँ |
राजा घोड़े से नीचे उतरा और नंदीय के पैरों में अपने धनुष-बाण रख कर बोला “ नंदीय , मैं तुम्हारी बात से बहुत प्रभावित हुवा , इस कारण तुम्हे छोड़ रहा हूँ “|
नंदीय मृग ने राजा से कहा, “तुम इसी तरह मेरे सभी मृग-भाइयों को नहीं छोड़ सकते हो, क्या ?
राजा अब और भी लज्जित हुवा और उसने प्रसन्न हो कर कहा कि “ मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज से तुम्हारे किसी भी मृग भाई को नहीं मारूँगा |
नंदीय ने राजा से फिर कहा “ राजा क्या तुम जल-जंगल-आकाश के सभी जीवों को नहीं मारने की प्रतिज्ञा कर सकते हो क्या ?
राजा अब एकदम विस्मित सा नंदीय को ध्यानस्थ भाव से देख रहा था और फिर अचानक उसका ध्यान हटा और वह प्रसन्न हो कर बोला “ क्यों नहीं नंदीय , मैं आज से प्रतिज्ञा करता हूँ कि मेरे जीवन काल में कभी भी किसी भी जीव की हत्या नहीं करूँगा और साथ ही यह घोषणा करता हूँ कि मेर्रे राज्य की सीमा में कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार के जीव की हत्या नहीं करेगा“|
राजा ब्रह्मदत उस दिन से के शाकाहारी भोजन करने लग गये और आजीवन अपने राज्य में जीव हत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया |
जानते हैं और नंदीय मृग कौन था ? तो ये मृग थे गौतम बुद्ध जिन्होंने मृग का रूप धारण कर राजा ब्रह्मदत को अहिंसा का ज्ञान दिया |