असली उत्तराधिकारी
बहुत वर्षों पहले बिहार में जमुना दास नाम का एक व्यापारी रहता था । जब बिहार में उसका व्यापार ठप्प गया तो वह दूर गुजरात में जाकर अपना व्यापार करने लगा। वहां उसका व्यापार जम गया।
जमुना दास का एक लड़का था जिसका नाम अशोक था , अशोक नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ता था।
जब अशोक पढ़ाई के लिए अपने विश्वविद्यालय आया हुआ था उन दिनों में पीछे जमुना दास की पत्नी अमली का देहांत हो गया और अमली के विरह में थोड़े दिनों बाद ही जमुना दास ने भी प्राण त्याग दिए। जमना दास ने अपनी मृत्यु से पहले अपनी सारी संपत्ति अपने पुत्र अशोक के नाम कर दी और एक न्यायाधीश को सौंपते हुए कहा कि अगर मेरी मृत्यु हो जाने के बाद जब अशोक आए तो उसे यह दे देना।
कुछ समय बाद जब अशोक को अपने पिता की मृत्यु का समाचार मिला तो वह रोता बिलखता गुजरात की ओर चल पड़ा। उसके साथ में उसका एक मित्र भी आ रहा था वह बहुत चालाक था और सहानुभूति जताकर अशोक के साथ आ रहा था, जब अशोक और उसका मित्र दोनों घर पहुंचे घर सुना देखकर दोनों रोने लगे।

जब उस न्यायाधीश को पता लगा कि अशोक घर आया है तो उसने उसे अपने घर बुलाया और अपनी संपत्ति के सारे कागजात लेने को कहा यह बात सुनकर उसके मित्र के मन में लालच आ गया। जब वे दोनों न्यायाधीश के घर पहुंचे तो दोनों कहने लगे कि मैं अशोक हूं और मेरे पिता का निधन हो गया इसलिए उसका उत्तराधिकारी मैं हूँ और वे लड़ने लगे।
अब न्यायाधीश के सामने यह प्रश्न खड़ा हो गया कि वास्तविक अशोक कौन है ? न्यायाधीश ने अपने नौकर को भेजकर जमुना दास के घर से उनका एक चित्र मंगवाया और कहा कि जमुना दास ने कहा था कि जो उत्तराधिकारी मेरा पुत्र होगा वह मेरी मूर्ति के एक पत्थर मारेगा । और दोनों को एक-एक पत्थर हाथ में दे दिए । और पत्थर मारने का आदेश दिया ।

अशोक का जो मित्र था उसने सबसे पहले जोर से पत्थर उसे मूर्ति को मार दिया । फिर न्यायाधीश ने वास्तविक अशोक से कहा अब तुम भी मारो । अशोक ने कहा कि मैं मेरे पिता को पत्थर नहीं मार सकता , भले ही संपत्ति इसको दे दी जाए । न्यायाधीश ने अब यह जान लिया कि वास्तविक उत्तराधिकारी कौन है उन्होंने उसके चालाक मित्र को पड़कर जेल भिजवा दिया ।
शिक्षा :अपने मित्र के साथ कभी भी धोखा नहीं करना चाहिए।