प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार नियंत्रण: संस्थागत सुधारों की वर्तमान स्थिति
भूमिका
यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम्। तथा सर्वाणि भूतानि बिभर्ति प्रजापालनम्॥
प्राचीन भारतीय नीति-शास्त्र का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जैसे पृथ्वी सभी जीवों का बिना किसी भेदभाव के पोषण करती है, ठीक उसी प्रकार एक आदर्श शासन व्यवस्था को भी अपनी समस्त प्रजा का समान रूप से संरक्षण और पालन करना चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक कल्याणकारी राज्य की आधारशिला उसकी प्रशासनिक व्यवस्था की निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही पर टिकी होती है। कौटिल्य ने अपने ‘अर्थशास्त्र’ में लिखा था कि “जैसे जीभ पर रखे शहद या विष का स्वाद न लेना असंभव है, वैसे ही सरकारी अधिकारियों द्वारा जन-धन का थोड़ा-बहुत आस्वादन न करना कठिन है।” यह ऐतिहासिक सत्य दर्शाता है कि भ्रष्टाचार और प्रशासनिक उत्तरदायित्व का अभाव कोई आधुनिक समस्या नहीं है, बल्कि यह मानव स्वभाव और सत्ता के केंद्रीकरण से उपजी एक सनातन चुनौती है।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने ‘स्वराज’ के साथ ‘सुराज’ (सुशासन) की परिकल्पना की थी। स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय संविधान के निर्माताओं ने एक ऐसी प्रशासनिक प्रणाली की नींव रखी जो लोक कल्याण के प्रति पूर्णतः समर्पित हो। संविधान का अनुच्छेद 300A संपत्ति के अधिकार और विधि के शासन का आधार प्रस्तुत करता है, जबकि अनुच्छेद 14 समानता और गैर-तार्किक विवेकाधिकार पर रोक लगाता है। भारतीय संविधान के भाग 4 में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्व (DPSP), विशेषकर अनुच्छेद 38, राज्य को यह निर्देश देते हैं कि वह ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करे जिसमें लोक कल्याण की अभिवृद्धि हो। परंतु यदि प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचार व्याप्त हो, तो संवैधानिक प्रावधान केवल कागजी आदर्श बनकर रह जाते हैं।
मुख्य विचार एवं बहुआयामी आयाम
प्रशासनिक जवाबदेही का तात्पर्य यह सुनिश्चित करना है कि लोक सेवक अपने कार्यों, निर्णयों और वित्तीय संसाधनों के उपयोग के लिए जनता और संसद के प्रति उत्तरदायी हों। यह उत्तरदायित्व दो स्तरों पर होता है: आंतरिक (विभागीय निगरानी, ऑडिट) और बाह्य (संसद, न्यायपालिका, मीडिया, नागरिक समाज)।
राजनीतिक और संवैधानिक आयाम: भारतीय व्यवस्था में विधायिका के प्रति कार्यपालिका का उत्तरदायित्व संविधान के अनुच्छेद 75(3) में निहित है। संसद विभिन्न समितियों (जैसे लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति) और कैग (CAG – अनुच्छेद 148) के माध्यम से वित्तीय अनुशासन बनाए रखती है। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 संस्थागत तंत्र के प्रमुख अंग हैं।
आर्थिक एवं संस्थागत आयाम: भूमंडलीकरण के दौर में भ्रष्टाचार केवल एक नैतिक अपराध नहीं, बल्कि एक गंभीर आर्थिक बाधा है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी ‘भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक’ (Corruption Perceptions Index) में भारत की स्थिति यह दर्शाती है कि हमें संस्थागत सुधारों की दिशा में निरंतर काम करने की आवश्यकता है। विश्व बैंक की रिपोर्ट्स के अनुसार, भ्रष्टाचार से पूंजी निवेश हतोत्साहित होता है और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की लागत में अप्रत्याशित वृद्धि होती है।
तकनीकी एवं डिजिटल आयाम: डिजिटल गवर्नेंस और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) ने बिचौलियों की भूमिका को समाप्त कर संस्थागत पारदर्शिता को नया आयाम दिया है। ‘ई-गवर्नेंस’, ‘डिजिटल इंडिया’, ‘फेसमैन-लेस असेसमेंट’ और ‘सरकारी ई-मार्केटप्लेस’ (GeM) जैसे सुधारों ने लोक सेवकों के अनुचित विवेकाधिकार (Discretionary Power) को न्यूनतम कर दिया है।
सकारात्मक प्रभाव एवं वास्तविक सार्थकता
पिछले कुछ दशकों में किए गए संस्थागत और कानूनी सुधारों के सकारात्मक परिणाम प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहे हैं।
सूचना का अधिकार और नागरिक सशक्तीकरण: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) ने भारत के नागरिक को मात्र एक लाभार्थी (Beneficiary) से बदलकर एक सजग सतर्ककर्ता (Vigilant Citizen) बना दिया है। इसने फाइलों में बंद प्रशासनिक फैसलों को सार्वजनिक बहस के दायरे में ला खड़ा किया है।
डीबीटी और वित्तीय पारदर्शिता: आर्थिक समीक्षा के अनुसार, जनधन-आधार-मोबाइल (JAM) त्रिमूर्ति के माध्यम से सीधे बैंक खातों में धनराशि स्थानांतरित करने से लीकेज और फर्जी लाभार्थियों (Ghost Beneficiaries) का सफाया हुआ है। इससे सरकारी खजाने के अरबों रुपये की बचत हुई है और अंतिम व्यक्ति तक कल्याणकारी योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ पहुंचा है।
विहिसलब्लोअर संरक्षण और निवारक सतर्कता: भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 ने रिश्वत देने वाले और लेने वाले दोनों के संदर्भ में कड़े प्रावधान किए हैं। इसके साथ ही, विहिसलब्लोअर प्रोटेक्शन कानून और सीवीसी द्वारा चलाए जा रहे ‘निवारक सतर्कता’ (Preventive Vigilance) अभियानों ने संस्थानों के भीतर जवाबदेही का संस्कृतिगत वातावरण निर्मित किया है।
व्यावहारिक चुनौतियाँ एवं अंधकारमय पहलू
इन तमाम संस्थागत सुधारों के बावजूद प्रशासनिक व्यवस्था में कई ऐसी संरचनात्मक और व्यावहारिक कमियां हैं जो भ्रष्टाचार नियंत्रण के मार्ग में रोड़ा बनी हुई हैं।
संस्थागत स्वायत्तता और संसाधनों की कमी: लोकपाल और लोकायुक्त जैसी शीर्ष भ्रष्टाचार-रोधी संस्थाएं संसाधनों की कमी, कर्मचारियों के अभाव और जांच तंत्र के लिए अन्य एजेंसियों पर निर्भरता के कारण अपनी पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पा रही हैं। सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों की राजनीतिक तटस्थता और स्वायत्तता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
प्रशासनिक जटिलता और प्रक्रियात्मक विलंब: भारतीय न्यायिक प्रणाली में मुकदमों का भारी बैकलाग भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों के त्वरित निपटारे में बाधा है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत लोक सेवकों के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले पूर्व-अनुमति (Prior Sanction) की आवश्यकता कई बार ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण देती है, लेकिन वहीं यह भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक ढाल भी बन जाती है।
विवेकाधिकार और नौकरशाही का लालफीताशाही रवैया: नीतिगत स्तर पर सुधारों के बावजूद निचले स्तर के प्रशासन (Street-Level Bureaucracy) में नागरिक चार्टर (Citizens Charter) का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाता। पुलिस प्रशासन, राजस्व विभाग और स्थानीय निकायों में दैनिक नागरिक सेवाओं के लिए अभी भी प्रक्रियात्मक जटिलता का लाभ उठाकर भ्रष्टाचार किया जाता है।
संरचनात्मक मिलीभगत (Crony Capitalism): राजनीतिक चंदे, कॉरपोरेट लॉबिंग और प्रशासनिक गठजोड़ के कारण नीतिगत भ्रष्टाचार (Policy Paralysis/Policy Corruption) को पूरी तरह समाप्त करना एक कठिन चुनौती बना हुआ है।
सुधार के उपाय एवं आगे की राह (Way Forward)
भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए एक समग्र और बहुस्तरीय रणनीति की आवश्यकता है।
- संस्थागत स्वायत्तता और त्वरित न्याय: सीबीआई और सीवीसी जैसी संस्थाओं को अधिक स्वायत्तता और वित्तीय स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की सिफारिशों के अनुसार, भ्रष्टाचार के मामलों के निपटारे के लिए विशेष अदालतों (Special Courts) की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए और समयबद्ध सुनवाई (Time-bound Trial) सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- सिविल सेवा सुधार और प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन: सिविल सेवा में ‘लेटरल एंट्री’ के माध्यम से विशेषज्ञता को बढ़ावा देने के साथ-साथ ‘मिशन कर्मयोगी’ के तहत अधिकारियों में नैतिक मूल्यों और नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण का विकास किया जाना चाहिए। भारतीय प्रशासनिक सेवा नियम (Article 311 की सीमाओं का ध्यान रखते हुए) के तहत अप्रभावी और अयोग्य अधिकारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) देने की प्रक्रिया को और पारदर्शी व कठोर बनाया जाना चाहिए।
- डिजिटल गवर्नेंस का विस्तार और एआई का प्रयोग: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग सरकारी खरीद, कर निर्धारण और निविदा आवंटन में संदिग्ध पैटर्नों को पहचानने के लिए किया जाना चाहिए। ब्लॉकचेन तकनीक के माध्यम से भूमि रिकॉर्ड और सार्वजनिक अभिलेखों को सुरक्षित और अपरिवर्तनीय बनाया जा सकता है।
- नागरिक चार्टर को कानूनी बाध्यता बनाना: सेवा का अधिकार कानून (Right to Services Act) को केंद्रीय और राज्य स्तर पर एक समान रूप से लागू किया जाना चाहिए। तय सीमा में सेवा न मिलने पर संबंधित अधिकारी के वेतन से दंड काटने का प्रावधान होना चाहिए, जिससे निचले स्तर की प्रशासनिक जवाबदेही तय हो सके।
- राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता: राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पूर्ण पारदर्शिता लाना और चुनाव सुधारों को प्राथमिकता देना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि राजनीतिक भ्रष्टाचार ही प्रशासनिक भ्रष्टाचार की जननी बनता है।
निष्कर्ष
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
‘मुंडकोपनिषद’ का यह अमर वाक्य हमारे राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न पर अंकित है, जो याद दिलाता है कि अंततः विजय सत्य और निष्ठा की ही होती है। प्रशासनिक जवाबदेही केवल कागजी नियमों और दंडात्मक प्रावधानों से स्थापित नहीं की जा सकती; इसके लिए एक मजबूत नैतिक चेतना और प्रशासनिक संस्कृति में बदलाव (Attitudinal Change) की आवश्यकता है।
‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जीरो टॉलरेंस अगेंस्ट करप्शन की नीति अनिवार्य शर्त है। जब तक प्रशासन का हर अंग ‘नागरिक-प्रथम’ (Citizen-First) के भाव से कार्य नहीं करेगा, तब तक आर्थिक समृद्धि का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचेगा। संस्थागत स्वायत्तता, जन-भागीदारी, तकनीकी पारदर्शिता और नैतिक नेतृत्व के चतुर्भुज से ही हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर सकते हैं जहाँ प्रशासन जवाबदेह हो, संस्थाएं निष्पक्ष हों और नागरिक पूरी तरह सशक्त हों।
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