🙏🏻इसे अपने परिवार, दोस्तों और बच्चों के साथ व्हाट्सऐप व फ़ेसबुक पर शेयर करना बिल्कुल न भूलें |

प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार नियंत्रण: संस्थागत सुधारों की वर्तमान स्थिति

भूमिका

  1. संस्थागत स्वायत्तता और त्वरित न्याय: सीबीआई और सीवीसी जैसी संस्थाओं को अधिक स्वायत्तता और वित्तीय स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की सिफारिशों के अनुसार, भ्रष्टाचार के मामलों के निपटारे के लिए विशेष अदालतों (Special Courts) की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए और समयबद्ध सुनवाई (Time-bound Trial) सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  2. सिविल सेवा सुधार और प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन: सिविल सेवा में ‘लेटरल एंट्री’ के माध्यम से विशेषज्ञता को बढ़ावा देने के साथ-साथ ‘मिशन कर्मयोगी’ के तहत अधिकारियों में नैतिक मूल्यों और नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण का विकास किया जाना चाहिए। भारतीय प्रशासनिक सेवा नियम (Article 311 की सीमाओं का ध्यान रखते हुए) के तहत अप्रभावी और अयोग्य अधिकारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) देने की प्रक्रिया को और पारदर्शी व कठोर बनाया जाना चाहिए।
  3. डिजिटल गवर्नेंस का विस्तार और एआई का प्रयोग: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग सरकारी खरीद, कर निर्धारण और निविदा आवंटन में संदिग्ध पैटर्नों को पहचानने के लिए किया जाना चाहिए। ब्लॉकचेन तकनीक के माध्यम से भूमि रिकॉर्ड और सार्वजनिक अभिलेखों को सुरक्षित और अपरिवर्तनीय बनाया जा सकता है।
  4. नागरिक चार्टर को कानूनी बाध्यता बनाना: सेवा का अधिकार कानून (Right to Services Act) को केंद्रीय और राज्य स्तर पर एक समान रूप से लागू किया जाना चाहिए। तय सीमा में सेवा न मिलने पर संबंधित अधिकारी के वेतन से दंड काटने का प्रावधान होना चाहिए, जिससे निचले स्तर की प्रशासनिक जवाबदेही तय हो सके।
  5. राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता: राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पूर्ण पारदर्शिता लाना और चुनाव सुधारों को प्राथमिकता देना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि राजनीतिक भ्रष्टाचार ही प्रशासनिक भ्रष्टाचार की जननी बनता है।

निष्कर्ष

सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।

‘मुंडकोपनिषद’ का यह अमर वाक्य हमारे राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न पर अंकित है, जो याद दिलाता है कि अंततः विजय सत्य और निष्ठा की ही होती है। प्रशासनिक जवाबदेही केवल कागजी नियमों और दंडात्मक प्रावधानों से स्थापित नहीं की जा सकती; इसके लिए एक मजबूत नैतिक चेतना और प्रशासनिक संस्कृति में बदलाव (Attitudinal Change) की आवश्यकता है।

‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जीरो टॉलरेंस अगेंस्ट करप्शन की नीति अनिवार्य शर्त है। जब तक प्रशासन का हर अंग ‘नागरिक-प्रथम’ (Citizen-First) के भाव से कार्य नहीं करेगा, तब तक आर्थिक समृद्धि का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचेगा। संस्थागत स्वायत्तता, जन-भागीदारी, तकनीकी पारदर्शिता और नैतिक नेतृत्व के चतुर्भुज से ही हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर सकते हैं जहाँ प्रशासन जवाबदेह हो, संस्थाएं निष्पक्ष हों और नागरिक पूरी तरह सशक्त हों।

पढ़े और निबंध :👇👇🔥🔥🔥🔥🔥

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *