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विकसित भारत @2047: आर्थिक समृद्धि और समावेशी विकास का रोडमैप

भूमिका

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥

यह प्राचीन उपनिषदिक प्रार्थना केवल एक नैतिक संदेश नहीं है, बल्कि भारत के आर्थिक विकास का मूल दर्शन है। वर्ष 2047 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएगा, तब लक्ष्य केवल आर्थिक आंकड़ों में वृद्धि नहीं, बल्कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक समृद्धि का पहुंचना है। स्वतंत्रता के अमृत काल में प्रधानमंत्री द्वारा घोषित ‘विकसित भारत @2047’ का संकल्प केवल एक राजनैतिक घोषणा नहीं है, बल्कि यह 1.4 अरब भारतीयों की आकांक्षाओं का एकीकृत दस्तावेज है।

ऐतिहासिक रूप से, 1947 में स्वतंत्रता के समय भारत की जीडीपी वैश्विक अर्थव्यवस्था का मात्र 3 प्रतिशत थी, जो 1991 के एलपीजी सुधारों से गुजरते हुए आज लगभग 3.7 ट्रिलियन डॉलर के साथ विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है। हालांकि, सच्चा विकास केवल जीडीपी के आकार से निर्धारित नहीं होता, बल्कि इस बात से तय होता है कि देश अपने नागरिकों को जीवन की गुणवत्ता, समानता और अवसर किस सीमा तक प्रदान कर पा रहा है।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का संकल्प इस यात्रा का वैचारिक ढांचा प्रदान करता है। संविधान का अनुच्छेद 38 राज्य को लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने का निर्देश देता है। इस प्रकार, ‘विकसित भारत @2047’ का रोडमैप संवैधानिक मूल्यों, आर्थिक वृद्धि और सामाजिक न्याय का एक त्रिवेणी संगम है।

मुख्य विचार एवं बहुआयामी आयाम

आर्थिक समृद्धि और समावेशी विकास दो ऐसे स्तंभ हैं जिन्हें एक-दूसरे से पृथक नहीं किया जा सकता। नीति आयोग के विज़न डॉक्यूमेंट के अनुसार, 2047 तक भारत को 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने और प्रति व्यक्ति आय को लगभग 18,000 डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

सामाजिक और मानव पूंजी आयाम:

मानव विकास सूचकांक (HDI) में सुधार के बिना विकसित भारत की कल्पना बेमानी है। भारत की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या कार्यशील आयु वर्ग में है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) भारत की सबसे बड़ी ताकत है। नई शिक्षा नीति 2020 और ‘पीएम-श्री’ जैसी योजनाएं शिक्षा के ढांचे को पुनर्परिभाषित कर रही हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में ‘आयुष्मान भारत’ के माध्यम से दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सुरक्षा योजना संचालित की जा रही है, जो आर्थिक झटकों से गरीब परिवारों की रक्षा करती है।

आर्थिक एवं तकनीकी आयाम:

डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) जैसे यूपीआई, आधार और डिजिलॉकर ने भारत को वैश्विक मंच पर एक तकनीकी अगुवा बनाया है। आर्थिक समीक्षा के अनुसार, भारत में वित्तीय समावेशन को जनधन-आधार-मोबाइल (JAM) त्रिमूर्ति ने अभूतपूर्व गति दी है। इसके अतिरिक्त, निर्माण क्षेत्र को गति देने के लिए ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ (PLI) योजना और अवसंरचना विकास के लिए ‘पीएम गतिशक्ति’ मास्टर प्लान भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) का केंद्र बना रहे हैं।

संवैधानिक एवं प्रशासनिक आयाम:

अनुच्छेद 39(b) और (c) के तहत संसाधनों का न्यायसंगत वितरण और धन का संकेंद्रण रोकना राज्य का दायित्व है। प्रशासनिक स्तर पर ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ का सिद्धांत, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से भ्रष्टाचार पर लगाम और ‘आकांक्षी जिला कार्यक्रम’ जैसे प्रयोग विकास के क्षेत्रीय असंतुलन को दूर कर रहे हैं।

सकारात्मक प्रभाव एवं वास्तविक सार्थकता

इस रोडमैप का सकारात्मक प्रभाव पहले से ही धरातल पर दिखाई दे रहा है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 9 वर्षों में लगभग 24.8 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले हैं। यह समावेशी विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

अंतिम व्यक्ति का सशक्तीकरण:

ग्रामीण क्षेत्रों में ‘पीएम आवास योजना’, ‘हर घर जल’ मिशन और स्वच्छ भारत अभियान ने बुनियादी जीवन स्तर में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। इन योजनाओं ने महिलाओं के समय और श्रम की बचत कर उन्हें आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर दिया है।

महिला-नेतृत्व वाला विकास (Women-led Development):

संविधान का अनुच्छेद 15 और 39(a) लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करने और समान आजीविका के साधन प्रदान करने की बात करता है। मुद्रा योजना के तहत 70 प्रतिशत से अधिक ऋण महिला उद्यमियों को दिए गए हैं। स्व-सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से ग्रामीण महिला अर्थव्यवस्था को नया बल मिला है।

पर्यावरणीय निरंतरता:

भारत ने ‘लाइफ’ (LiFE – Lifestyle for Environment) आंदोलन और ‘पंचामृत’ संकल्पों के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) का नेतृत्व भारत की वैश्विक हरित पहल का प्रतीक है।

व्यावहारिक चुनौतियाँ एवं अंधकारमय पहलू

उज्ज्वल भविष्य के रोडमैप में कई गंभीर संरचनात्मक चुनौतियां भी विद्यमान हैं, जिन्हें अनदेखा करना आत्मघाती हो सकता है।

आय की असमानता:

ऑक्सफैम (Oxfam) और वर्ल्ड इनक्वालिटी रिपोर्ट के आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में धन और आय का संकेंद्रण तेजी से बढ़ा है। ऊपरी 1 प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा है। यह असमानता सामाजिक ताने-बाने के लिए जोखिम पैदा करती है।

रोजगार सृजन और कौशल की कमी:

आर्थिक वृद्धि दर के अनुरूप औपचारिक क्षेत्र में पर्याप्त रोजगार का सृजन न होना एक बड़ी समस्या है। भारत की एक बड़ी कार्यबल आबादी अभी भी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है, जहाँ सामाजिक सुरक्षा का अभाव है। इसके अतिरिक्त, उद्योग की ज़रूरतों और कार्यबल के कौशल के बीच एक बड़ा अंतर (Skill Gap) बना हुआ है।

कृषि क्षेत्र का संकट:

देश की लगभग 45 से 50 प्रतिशत आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है, लेकिन जीडीपी में इसका योगदान केवल 16-17 प्रतिशत के आसपास है। जलवायु परिवर्तन, प्रच्छन्न बेरोजगारी और कम उत्पादकता के कारण कृषि क्षेत्र दबाव में है।

क्षेत्रीय असंतुलन और डिजिटल डिवाइड:

दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्य उत्तर और पूर्वी राज्यों की तुलना में तेजी से विकसित हो रहे हैं। इसके साथ ही, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच डिजिटल पहुंच में भारी अंतर (Digital Divide) विद्यमान है, जो समावेशी विकास के रास्ते में बाधा है।

सुधार के उपाय एवं आगे की राह (Way Forward)

2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी कार्यान्वयन की आवश्यकता है।

  1. द्वितीय कृषि क्रांति और ग्रामीण पुनरुद्धार :

कृषि को आधुनिक तकनीक (एग्री-टेक), प्राकृतिक खेती और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से जोड़ना होगा। ‘किसान उत्पादक संगठनों’ (FPOs) को मजबूत कर और मूल्य संवर्धन (Value Addition) द्वारा किसानों की आय में वास्तविक वृद्धि सुनिश्चित की जानी चाहिए।

  1. श्रम-गहन निर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन :

वियतनाम और बांग्लादेश की तर्ज पर भारत को कपड़ा, चमड़ा और इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली जैसे श्रम-गहन (Labor-intensive) उद्योगों पर ध्यान केंद्रित करना होगा ताकि असंगठित कार्यबल को औपचारिक रोजगार में लाया जा सके।

  1. अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश :

भारत वर्तमान में अपनी जीडीपी का मात्र 0.7 प्रतिशत R&D पर खर्च करता है, जबकि विकसित देश 2 से 3 प्रतिशत खर्च करते हैं। निजी क्षेत्र को नवाचार और अनुसंधान में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

  1. सहकारी संघवाद की मजबूती :

‘केरल मॉडल’ की स्वास्थ्य-शिक्षा व्यवस्था और ‘ओडिशा मॉडल’ के आपदा प्रबंधन जैसी स्थानीय सफलता की कहानियों को पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए। राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोग (Competitive and Cooperative Federalism) अनिवार्य है।

  1. समावेशी सुशासन और विकेंद्रीकरण :

संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के तहत स्थानीय स्वशासन (पंचायतों और नगर निकायों) को वित्तीय और प्रशासनिक रूप से और अधिक सशक्त बनाना होगा, ताकि विकास का रोडमैप वास्तव में निचले स्तर (Bottom-up Approach) से तैयार हो।

निष्कर्ष

विकसित भारत @2047 का सपना केवल बुनियादी ढांचे और आर्थिक मापदंडों का ढांचा भर नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक भारतीय के आत्मसम्मान और सुरक्षा का संकल्प है। महर्षि अरविंद ने कहा था कि भारत का उत्थान केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता को शांति और समृद्धि का मार्ग दिखाने के लिए आवश्यक है।

यदि हम आर्थिक विकास की गति को बनाए रखते हुए सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय संतुलन और संवैधानिक मर्यादाओं को अपना मार्गदर्शक बनाएं, तो कोई कारण नहीं कि 2047 का भारत न केवल एक ‘विकसित राष्ट्र’ बने, बल्कि विश्व गुरु के रूप में संपूर्ण मानवता का मार्गदर्शन भी करे। यह रोडमैप केवल एक गंतव्य नहीं, बल्कि एक निरंतर साधना है, जिसमें सरकार, निजी क्षेत्र और प्रत्येक नागरिक की भागीदारी अनिवार्य है।

पदम् पदम् वर्धते जोशः, कार्यमस्तु साध्यम।
भारतं भवेत् समृद्धम्, सर्वजनहितैषिणम्॥

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