एक अच्छे नागरिक के कर्तव्य और जिम्मेदारियां (Essay in Hindi)
तुम्हारा भविष्य और कर्त्तव्य: स्वतंत्र भारत में छात्रों की भूमिका
देश के विकास में युवा शक्ति का महत्व: एक संपूर्ण निबंध
भूमिका (Introduction),
प्यारे बच्चो ! तुम सब देश की शक्ति एवं सम्पत्ति हो। तुम भावी भारत के कर्णधार हो। आज नहीं तो कल तुम्हें देश की रक्षा, उन्नति एवं जागृति का कार्य सम्भालना है, देश का आर्थिक एवं नैतिक विकास करना है तथा विश्व के अन्य देशों के समाज में अपने देश को गौरवपूर्ण स्थान दिलाना है। इन महान कर्त्तव्यों के प्रति तुम्हें अभी से जागरूक रहना है। यदि ऐसा कर सकोगे तभी उन जिम्मेदारियों का निर्वाह अच्छी तरह कर सकोगे। अब तुम यह पूछ सकते हो कि इतनी बड़ी जिम्मेदारियों का निर्वाह अपने छोटे कन्धों पर तुम कैसे कर सकोगे ? आज मैं तुम्हें कुछ इसी प्रकार की बातें बतलाना चाहता हूँ जो भविष्य में काम आवें और जिनके पालन से तुम अपने को जिम्मेदार नागरिक बना सको।
जनतंत्र और नागरिक (Democracy & Citizen),
तुम्हें मालूम है कि वर्षों की कठिन लड़ाई के बाद भारत सन् 1947 में स्वतंत्र हुआ। आज स्वतंत्र भारत में भारत के नागरिकों का राज्य है। तुम कहोगे भारत के नागरिक नहीं, बल्कि कुछ इने-गिने नेता इसका शासन भार सम्भाले हुए हैं। किन्तु जैसा तुम सोचते हो वैसा नहीं है। जो लोग इस देश का शासन कर रहे हैं, वे भारतीय जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं। इन नेताओं को प्रति पाँचवें वर्ष जनता चुनती है और इस प्रकार उन्हें शासन का अधिकार देती है। यदि कोई नेता जनता के हित में कार्य नहीं करता तो अगली बार जनता उसे नहीं चुनेगी। यह वह शासन-व्यवस्था है जो जनता द्वारा बनाई गई है। इस व्यवस्था में जनता द्वारा चुने हुए लोग जनता एवं देश के हित में कार्य करते हैं। इस प्रकार की शासन-व्यवस्था को जनतंत्र, अर्थात् जनता का शासन कहते हैं। जब तुम भी वयस्क हो जाओगे तो तुम्हें भी वोट देने का अधिकार मिलेगा। उस समय तुम भी वोट देने के पूर्व सोचना कि जो लोग चुनाव में खड़े हैं उनमें से कौन सबसे अच्छा और जनता तथा देश का शुभचिन्तक उम्मीदवार है। ऐसे ही उम्मीदवारों को वोट देना चाहिए जो जनता के सुख-दुख और देश की आवश्यकताओं तथा हितों को समझें। तभी देश का शासन अच्छी तरह से चल सकता है। यह तो रही देश की शासन व्यवस्था तथा उसमें तुम्हारे कर्त्तव्य की बात। अब मैं यह बतलाना चाहता हूँ कि तुम अपना जीवन किस प्रकार व्यतीत करो कि एक अच्छे नागरिक बन सको।
यह विश्व एक कर्मलोक है। इसमें कर्म की प्रधानता है। इसलिए कर्म करना हमारा अधिकार भी है और कर्त्तव्य भी। अब तुम पूछ सकते हो, कैसा कार्य करना चाहिए। तो मैं कहूँगा कि वह कार्य करो जो तुम्हें भी अच्छा लगे और दूसरों को भी। कोई कार्य जो तुम्हें पसंद है किन्तु औरों को पसंद नहीं है तो उसे नहीं करना चाहिए। क्योंकि तुम्हें समाज में रहना है और समाज में अनेक लोग होते हैं—तुम्हारे ही कई साथी होंगे।
युवाओं के नैतिक गुण (Moral Values)
यदि समाज और तुम्हारे साथी उस कार्य को पसंद नहीं करते तो तुम्हें उसे नहीं करना चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं कि तुम स्वयं सोचना बंद कर दो और जो दूसरे कहें वही करो। बल्कि तुम्हें इस बात पर सोचना चाहिए कि अमुक कार्य को दूसरा क्यों नहीं पसन्द करता और कारण समझ में आ जाय तो उसे नहीं करना चाहिए। कारण समझ में न आये तो अपने बड़े-बूढ़ों से पूछ लेना चाहिए कि मैं इस कार्य को क्यों न करूँ—दूसरे लोग इसे क्यों नापसन्द करते हैं ? इस प्रकार तुम्हारी शंका का समाधान हो जाएगा। ऐसा करने से तुम्हारे अन्दर कई गुणों का विकास होगा—जैसे अनुशासन का पालन, सहानुभूति, सोच-समझ कर कार्य करने की आदत और बड़ों का स्नेह पात्र बनना। इससे तुम्हारी उन्नति का मार्ग विस्तृत होगा। तुम्हें अपने अच्छे कार्यों में बड़ों का आशीर्वाद, साथियों की सहानुभूति एवं समाज से साधुवाद मिलेगा।
एक बात तुम्हारे ध्यान में हमेशा बनी रहनी चाहिए और वह यह कि तुम्हें समाज में रहना है—अकेले नहीं। तुम्हें केवल अपनी ही उन्नति नहीं करनी है बल्कि समाज की भी और देश की भी। समाज देश की एक छोटी इकाई है। ऐसी कई इकाइयों से देश बना है। यदि सबसे मिलकर रहने की आदत का विकास न हुआ तो समाज में फूट-बैर फैलेगा। समाज की एकता को खतरा होगा। जब समाज की एकता खतरे में होगी तो देश की एकता नहीं रहेगी। देश की एकता टूटेगी तो देश की सीमा पर खतरा होगा और देश कई टुकड़ों में बँट जाएगा। इसलिए तुम्हें अपने प्रत्येक कार्य में मेल-जोल की भावना, एक साथ आगे बढ़ने के गुण का विकास तथा अच्छे मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। जब इस प्रकार का प्रयास तुम बराबर करते रहोगे तो इन गुणों का विकास तुम्हारे अंदर होकर रहेगा।
अपने दैनिक कार्य में सच्चाई और लगन रखने से तुम जीवन में अच्छे गुणों का विकास कर सकोगे। सदा सच बोलना—यह कहावत नहीं है, बल्कि एक मंत्र है जिसे अपने व्यावहारिक जीवन में उतारना चाहिए। तुम जब अपने कार्य को लगन से करोगे, तब सफलता मिलेगी।
एक बात सदा ध्यान में रखने की है कि आशा एवं विश्वास से मूल्यवान कोई संपत्ति नहीं है। आशावान बनना जीवन का गुण है और निराश होना असफलता तथा मृत्यु का सूचक है। विश्वास रखने से कार्य में लगन बढ़ती है और आशावान रहने से कार्य को आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है। इस प्रकार आशा और विश्वास सफल जीवन का अमोघ-अस्त्र है। इसे कभी भी त्यागना नहीं चाहिए बल्कि अपने प्रतिदिन के कार्य में आशा एवं विश्वास को जाग्रत करते रहना चाहिए। यदि तुम ऐसा कर सकोगे तो तुम्हारे जीवन में निराशा नहीं आएगी। ध्यान रहे कि निराशा अकर्मण्यता का लक्षण है। अपना कार्य समय से करो और आशा तथा विश्वास के साथ करो। खेल का मैदान हो या स्कूल हो—घर का कार्य हो या सामाजिक कार्य हो—तुम्हारे सभी कार्य में आशा एवं विश्वास की झलक होनी चाहिए। चूँकि तुम्हें समाज में रहना है इसलिए मिलजुल कर रहने की आदत डालनी चाहिए। तुम्हें सत्य और अहिंसा का पालन करना चाहिए। ऐसा करने से तुम्हें वह सुख और संतोष मिलेगा जो किसी अन्य प्रकार से नहीं मिल सकता। इन्हीं गुणों के विकास से तुम देश के जिम्मेदार नागरिक बन सकते हो और देश की बहुमुखी प्रगति कर सकते हो।
तुम्हें अपने आस-पास के वातावरण पर भी सदा ध्यान रखना चाहिए। माता-पिता का आदर एवं उनकी आशा का पालन करने से तुम अपने अन्दर बड़ों के प्रति सम्मान का भाव एवं अनुशासन का गुण पैदा कर सकते हो। आज्ञाकारी बनना, अनुशासन में रहना और सहानुभूति रखना अच्छे गुण हैं। जिनमें ये गुण हैं वे देश के अच्छे नागरिक बन सकते हैं। आस-पास के लोगों के व्यवहार एवं बर्ताव का ध्यान रखने से आदमी बहुत-कुछ सीख सकता है। अपने आस-पास क्या हो रहा है, इसका ध्यान सभी को रखना चाहिए। इससे वातावरण के प्रति जागरूकता बढ़ती है।
उपसंहार (Conclusion)
बच्चों, भारत एक बहुत बड़ा देश है। इसमें अनेक जातियाँ रहती हैं और अनेक धर्म के लोग रहते हैं। ये सभी भारतवासी हैं और भारत के जिम्मेदार नागरिक हैं। अतएव सभी धर्मों के प्रति सहानुभूति एवं आदर का भाव रखना चाहिए। हो सकता है हम किसी विशेष धर्म से सहमत न हों, उसका पालन न करते हों किन्तु उस धर्म का अनादर करने का हमें कोई अधिकार नहीं है। सभी धर्म अच्छे हैं। सब धर्मों के बारे में जानना चाहिए, भले ही हम अपने धर्म का ही पालन करें। इससे एक-दूसरे को समझने में आसानी होती है और मेल-जोल बढ़ता है। अपने-अपने धर्म के प्रति सभी अच्छा भाव रखते हैं। हमें भी अपने धर्म का पालन करना चाहिए, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य धर्मों का अनादर करना चाहिए। सभी धर्म श्रेष्ठ हैं और हम जिस धर्म का पालन करते हैं वह भी श्रेष्ठ है। कोई भी धर्म बैर-भाव नहीं सिखाता। सभी धर्म सत्य एवं सहानुभूति का पाठ पढ़ाते हैं; सभी मनुष्य को मिल-जुलकर रहने का उपदेश देते हैं; गरीबों एवं अनाथों की सेवा की आज्ञा देते हैं और ईश्वर की उपासना का नियम बतलाते हैं। इस प्रकार सभी धर्म मनुष्य के लिए उपयोगी हैं और यदि वे उपयोगी हैं तो उनके प्रति अनादर भाव का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
सोच समझकर कार्य करना, मिलजुल कर रहना, अहिंसा एवं सत्य धर्म का पालन करना, आशा एवं विश्वास के साथ आगे बढ़ना और अनुशासन में रहना अच्छे गुण हैं। तुम्हें इन गुणों का समुचित विकास करना चाहिए और देश-प्रेम की भावना से सदा भर रहना चाहिए। तुम इन गुणों का विकास करोगे तो देश की एकता एवं सुरक्षा को कोई खतरा नहीं होगा।