(mahatma gandhi)महात्मा गाँधी का सादगी और विनोदपूर्ण जवाब
गोलमेज सम्मलेन में जब गाँधी भाग लेने गये थे तब उन्होंने तय किया था कि वे उस समय के महान फ्रेंच विचारक और लेखक रोम्या रोला से मिल कर आयेंगे |
रोम्या रोला स्विट्जर्लैंड में रह रहे थे| वे स्विट्जर्लैंड गये, रोम्या रोला से मिले| यंहा से बापू को रोम (वेटिकन सिटी) .जाना था|
रवाना होते समय रोम्या रोला उनको जिनेवा रेलवे स्टेशन तक छोड़ने आये | इस बात से स्विच सरकार को पहले से अवगत करा दिया था, तो उन्होंने महात्मा गाँधी के लिए रोम ट्रेन का फर्स्ट क्लास का टिकट बुक करा दिया, ये बात गाँधी को ध्यान में नहीं थी, वे रेलवे स्टेशन पर आए, तो रेलवे के अधिकारी ने आकर उनसे निवेदन किया कि आपका टिकेट फर्स्ट क्लास डिब्बे में बुक है वे चल कर अपनी सीट ग्रहण कर ले, उनके साथ में उनके सचिव महादेव देसाई भी थे |
गाँधी ने तुरंत उस अधिकारी को कहा “ हम तो तीसरे दर्जे के डिब्बे से जायेंगे |
महादेव देसाई ने कहा “बापू, क्या हर्ज है, ये तो अच्छी बात है , वहां तो भीड़ बहुत होगी “|
बापू बोले- “अगर भीड़ ज्यादा है तो कुछ सवारी हमारी सीट पर ले जाकर बिठा दो”| ऐसा कहते हुवे बापू तो तीसरे दर्जे के डिब्बे में चढ़ गये |
सीट पर बैठकर उन अधिकारियों को कहने लगे, “सुनो ! अगर आप नाराज हो तो , हमारा सामान पहले दर्जे वाले डिब्बे में चढ़ा दो |
बापू का इतना कहना था कि आस-पास के सब लोग ठहाका मार कर हँसने लगे |
महात्मा गाँधी के बारे में कुछ और जानकारी
सत्य बोलने की आदत
बचपन में गाँधी जी ने एक बार छोटी गलती की थी। उन्होंने अपने पिता को पत्र लिखकर अपनी गलती स्वीकार कर ली। उनके पिता ने उन्हें डाँटने के बजाय प्यार से माफ कर दिया। इस घटना ने गाँधी जी को जीवनभर सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
दक्षिण अफ्रीका की ट्रेन घटना
दक्षिण अफ्रीका में प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद केवल रंगभेद के कारण उन्हें ट्रेन से नीचे उतार दिया गया। इसी अपमान ने उनके भीतर अन्याय के खिलाफ लड़ने का संकल्प जगाया।
तीन बंदरों का संदेश
गाँधी जी के पास तीन बंदरों की छोटी मूर्ति रहती थी —
बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो।
यह उनके जीवन के नैतिक संदेश का प्रतीक बन गया।
सादा जीवन, उच्च विचार
गाँधी जी बहुत साधारण कपड़े पहनते थे। एक बार विदेश में किसी ने पूछा कि वे इतने कम कपड़े क्यों पहनते हैं, तो उन्होंने मुस्कराकर कहा — “मैं ऐसे देश का प्रतिनिधि हूँ जहाँ लाखों लोगों के पास पूरे कपड़े नहीं हैं।”
नमक सत्याग्रह (दांडी यात्रा)
अंग्रेजों के नमक कानून के विरोध में गांधी जी ने 1930 में साबरमती आश्रम से दांडी तक पैदल यात्रा की। यह आंदोलन पूरे देश में स्वतंत्रता की नई चेतना लेकर आया।
समय के पाबंद गाँधी जी
गाँधी जी समय का बहुत ध्यान रखते थे। वे हर काम तय समय पर करते थे और दूसरों को भी अनुशासन का महत्व समझाते थे।
चरखा और स्वदेशी आंदोलन
गाँधी जी स्वयं चरखा चलाकर सूत कातते थे। वे लोगों को विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करके स्वदेशी वस्तुएँ अपनाने की प्रेरणा देते थे।
बच्चों से विशेष प्रेम
गाँधी जी बच्चों को देश का भविष्य मानते थे। बच्चे उन्हें प्यार से “बापू” कहते थे। वे बच्चों को सत्य, स्वच्छता और अनुशासन की शिक्षा देते थे।
अहिंसा की शक्ति
गाँधी जी मानते थे कि हिंसा से नहीं बल्कि प्रेम और अहिंसा से बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। इसी सिद्धांत के कारण वे पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हुए।
“राष्ट्रपिता” का सम्मान
Subhas Chandra Bose ने पहली बार रेडियो प्रसारण में गाँधी जी को “राष्ट्रपिता” कहकर संबोधित किया। इसके बाद यह नाम पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गया।
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