👉 चंद्रचूड़ का पछतावा :विश्वास और जल्दबाज़ी की सीख की कहानी
👉 Chandrachud-ka-pachtawa Hindi story for kids

चंद्रचूड़ और साधु देवनिपुण | अविश्वास की सज़ा
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📖 पूरी कहानी
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पुराने ज़माने की बात है एक नगर में चंद्रचूड नाम का एक धनी सेठ रहता था , उसके पास बहुत सारे हीरे मोती , आभूषण थे | एक बार उसने तीर्थ यात्रा पर जाने का मानस बनाया पर अपना धन किसको सौंप कर जाये ताकि पीछे कोई चोरी भी ना करे और रास्ते में भी कोई लूटने का भय भी ना रहे |
पूरे नगर के लोगों के बारे में सोचने पर उसे नगर में तालाब पर रह रहे साधू देवनिपुण का ख्याल आया | सेठ की दृष्टि में देवनिपुण निस्पृह और विश्वाशी था
चंद्रचूड अपना सारा धन एक पोटली में बांध कर सुबह जल्दी देवनिपुण के पास जा पहुंचे , देवनिपुण अपने ध्यान में बैठे नाम जप रहे थे | चंद्रचूड ने प्रणाम किया और अपने आने का कारण बताया कि “महात्मा जी इस बार मैंने तीर्थयात्रा पर जाने का निश्चय किया है , मेरे पास कुछ धन है जिसे मैं आपके पास रख कर जा रहा हूँ , वापिस आने पर ले जा जाऊंगा |
देवनिपुण ने कहा कि “इस धन को और जगह रख देते तो अच्छा रहता”
सेठ ने बहुत आग्रह करते हुवे कहा कि मुझे आप पर विश्वाश है इसलिए मेरी विवशता के चलते रख लो|
सेठ जब नहीं माना तो देवनिपुण ने कहा “इस झोपड़ी में जहाँ चाहे रख दो”
सेठ ने झोपड़ी में पड़े एक टूटे हुवे बक्से में अपने धन की पोटरी को रख दिया और तीर्थ यात्रा को चला गया |
कुछ दिन के बाद जब चंद्रचूड़ तीर्थयात्रा से वापिस आया सबसे पहले वो देवनिपुण के पास अपना धन मांगने गया |
देवनिपुण ने उसका स्वागत किया ,अन्न-जल किया और फिर चंद्रचूड ने अपने धन की बात करी |
देवनिपुण ने कहा कि धन तो जहाँ आपने रखा था वहीँ है , ले लो |
चंद्रचूड ने बक्से में से अपनी पोटरी निकाली , वो वैसी की वैसी पड़ी थी जैसी वो रख कर गया था पर उसको मन में अविश्वाश हुवा कि कहीं इसमें से सिक्के निकाल तो नहीं लिए , वह गिनने बैठ गया |
सिक्के गिनने पर कुछ सिक्के कम हुवे तो चंद्रचूड ने कहा “तुमने सिक्के निकाले है , सिक्के दे दो”
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देवनिपुण ने कुछ भी जवाब नहीं दिया तो चंद्रचूड को पूरा विश्वाश हो गया कि सिक्के इसने ही निकाले है , वह उठा और साधू को पीटने लगा , और तब तक पीटता रहा जब तक वो घायल हो कर गिर नहीं गया |
साधू को बेहोशी की अवस्था में छोड़ वह अपने घर पहुंचा , अपनी घरवाली को सारी बात सुनाई | उसकी पत्नी बोली “पतिदेव, कुछ सिक्के तो मैंने पहले ही निकाल कर अपने पास रख लिए थे, मैं आपको बताना भूल गई थी, आपने साधू को अकारण ही पीट दिया”
चंद्रचूड दौड़ा दौड़ा वापिस साधू के पास गया और अपनी गलती के लिए क्षमा मांगने लगा , साधू के चेहरे पर किसी प्रकार का क्रोध नहीं ,न कोई उत्तर |
चंद्रचूड अपने किये पर पछता रहा था|👍
👍 इस कहानी से सीख
- संदेह के आधार पर कभी भी निर्णय नहीं लेना चाहिए |
- जल्दबाजी में किये गये निर्णय पर हमेशा पछताना पड़ता है |
- साधू -संतो के प्रति श्रद्धा भाव रखना चाहिए |