ज्ञान का अहंकार
मराठों के शासन के समय पूना के रहने वाले एक ब्राह्मण जिनका नाम चंद्रशेखर था, उनको अपने ज्ञान पर अहंकार था। एक बार वे किसी शास्त्रार्थ में पराजित हो गए और अपना अपमान होने के कारण घर त्याग दिया।
वे वहां से चलते-चलते किसी नगर में पहुंचे और एक घर के बाहर बने चबूतरे पर बैठ गए। उनके चेहरे पर अपमान का दुख साफ झलक रहा था।
उस घर के ऊपर से एक महिला ने उनको देखा तो सोचा कि अवश्य ये कोई महान पंडित है इनको आदर सत्कार देना चाहिए।
वो महिला अत्यंत सुंदर थी। पंडित जी के पास आई और उनको उस नगर में आने और इतना उदास होने का कारण पूछा।
पंडित जी ने कहा। कि उनका नाम चंद्रशेखर है और वे शास्त्रार्थ में एक प्रश्न का उत्तर न देने के कारण पराजित हो गए, इस अपमान के कारण वे दुखी है और घर त्याग दिया है।

उस महिला ने पूछा कि ऐसा क्या प्रश्न था ?
पंडित जी ने कहा कि प्रश्न था “ पाप की जड़ क्या है?
उस महिला ने कहा कि वो उनका आतिथ्य स्वीकार करे और उनके यहां पधारे।
पंडित जी उस महिला के घर चले गए, भोजन किया और फिर रात्रि विश्राम के लिए किसी मंदिर में चले गए।
जाते समय उस महिला ने पंडितजी को दस सोने के सिक्के दिए, और कहा कि अगर रोज मेरे यहां भोजन करेंगे तो उनको दस सिक्के रोज देगी।

अब पंडित जी हमेशा दिन में उस महिला के वहां आते , भोजन करते, दस सिक्के लेते और चले जाते।
वो महिला वैश्या थी और उस महिला के वहां कई सारे युवा , धनी लोग आते जाते, नाच संगीत चलता रहता और आने जाने वाले खुश होते।
धीरे धीरे पंडित जी को भी उस नाच संगीत में आनंद आने लगा और वे मन ही मन उस वैश्या के प्रति वासना से ग्रसित हो गए।
एक दिन उस वैश्या ने पंडित जी को कहा कि आपको आने-जाने में परेशानी होती है, आप मेरे घर पर ही रह जाए।
पंडित जी को लगा जैसे मन की मुराद पूरी हो गई।

समय पाकर एक दिन पंडितजी ने अपने मन की बात उस महिला से कह दी।
महिला ने पंडित को कहा कि ये ही आपके उस प्रश्न ‘पाप की जड़ क्या है?’ का उत्तर है।
पंडित जी ने कहा , कैसे?
आपने लोभ किया , पहले दस सिक्कों के लोभ से आप मेरे घर आने लगे, फिर आपको मेरे वहां हो रहे नृत्य गान से लोभ हुआ और फिर मेरे शरीर से।
लोभ के कारण ही आपके मन में वासना उत्पन्न हुई , और वासना के कारण आप पाप करने को तैयार हो गए। तो पाप की जड़ लोभ है।
मनुष्य को कभी भी अपने ज्ञान का अहंकार नहीं करना चाहिए |
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥
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