संगीत और डाकू
दक्षिणी भारत में एक रियासत थी त्रावणकौर। वहां तब तिरुनालु नामक राजा राज्य करते थे उनके दरबार में वडीवेलु नाम के एक संगीतज्ञ रहते थे , उनके संगीत के ज्ञान की कीर्ति देश भर में फैली थी ,संगीत में उनकी भारी रुचि थी, वडीवेलु एक दिन अपने घर पर संगीत साधना में आत्म विभोर हो गए वे दरबार में नहीं जा सके ।.

वडीवेलु का दरबार में ना आना राजा तिरुनालू को अच्छा नहीं लगा। अगले दिन वडीवेलु को दरबार में बुलाकर राजा ने डांटा , उन्हें अपनी रियासत से भी निकाल दिया। मंत्रियों ने राजा को बहुत समझाया, किंतु राजा अपने अहंकार के कारण उनकी बात नहीं माने ।
वडीवेलु भी स्वाभिमानी थे, वे राजा के सामने गिड़गिड़ाए नहीं। वे अपना थोड़ा सा सामान बांधकर चल पड़े। उनके पास अपना वाद्ययंत्र वेला भी था। चलते-चलते जब भी थक जाते तो वेला बजाकर अपनी थकान दूर कर लेते। काफी दूर चलने के बाद एक घना जंगल आ गया, वडीवेलु जब उसे पार कर रहे थे तो वे रास्ता भटक गए, तभी कुछ डाकुओं ने उन्हें आ घेरा। उनका सारा सामान और वेला(ivory violin) भी छीन लिया।

वडीवेलु ने डाकुओं से प्रार्थना कि “भाईयो ! मेरा तुम सब कुछ ले जाओ पर वेला लौटा दो क्योंकि संगीत मेरा प्राण है, इसके बिना मैं रह नहीं पाऊंगा। डाकुओं को लगा कि ये वेला तो हमारे काम का भी नहीं ये सोच उन पर दया आ गई उन्होंने वेला वडीवेलु को लौटा दिया। वडीवेलु डाकुओं के पास बैठ गए और वेला बजाकर गाने लगे , वेला का संगीत और वडीवेलु की मधुर आवाज में गाना डाकुओं को बहुत अच्छा लगा। उन्हें अपना भी ध्यान ना रहा जब गाना बंद हुआ तो डाकुओं को पश्चाताप हुआ , डाकुओं ने वडीवेलु का सारा सामान लौटा दिया और जंगल से बाहर तक स्वयं छोड़ आए उनके पैर छुए और भविष्य में किसी को ना लूटने की प्रतिज्ञा भी की। जब यह बात राजा तिरनालु ने सुनी तो उसे बहुत दुख हुआ और फिर राजा ने अपने मंत्री भेज कर सम्मान के साथ संगीतज्ञ वडीवेलु को वापस अपने दरबार में बुला लिया और क्षमा मांगी ।
शिक्षा _ इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कोई कितना भी दुष्ट प्राणी हो उसे अपने व्यवहार और संगीत के माध्यम से बदला जा सकता है।