
श्रद्धा और विनम्रता
Kyoto ka Rajyapal kittagaki_short hindi story for kids
Kyoto ka Rajyapal kittagaki_short hindi story for kids
क्योटो राज्य में कीटागाकी नाम का एक बालक धर्मगुरु मेइजी जी के पास पढ़ता था । वह बहुत गरीब था किंतु गुरु ने उसे अपने बालक की तरह पढ़ाया और बहुत ही होशियार और योग्य बनाया। बड़ा होकर यह बालक क्योटो राज्य का राज्यपाल बना ।
बहुत वर्षों बाद एक दिन कीटोगाकी अपने गुरु से मिलने के लिए गया और उसने गुरु के निवास के बाहर बैठे गुरु के शिष्य को अपना परिचय पत्र दिया जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था “ क्योटो राज्य का राज्यपाल किटागाकी “
शिष्य यह परिचय पत्र लेकर अंदर अपने गुरु मेइजी के पास गया और कहा कि कोई आपसे मिलने आया है यह है उसका परिचय पत्र ।
गुरु ने परिचय पत्र देखा और अपने शिष्य को कहा कि जाओ और इन महाशय से कह दो कि आपसे मुझे कोई काम नहीं है और ना ही मुझे आपसे मिलना ।
शिष्य ने जाकर गुरु के कहे शब्दों को वैसा का वैसे ही कीटागाकी को सुना दिया कीटागाकी ये सुन वहां से थोड़ी दूर गया और मन ही मन सोचने लगा कि क्या गलती हो गई मेरे से? फिर उसे ध्यान आया कि किसी साधु संत या महान व्यक्ति से मिलने के लिए विनम्रता से और श्रद्धा से जाना चाहिए वह वहां से वापस गया और अबकी बार उसने अपने परिचय पत्र पर सिर्फ अपना नाम “कीटागाकी” लिखा और शिष्य से कहा एक बार फिर यह परिचय पत्र गुरु जी को दीजिए ।
शिष्य ने वैसा ही किया वह परिचय पत्र लेकर फिर गुरु के पास गया गुरु ने परिचय पत्र देखा और देखते ही कहा अच्छा कीटागाकी आया है ले आओ, उसे अंदर ले आओ, उससे मिलने की बहुत तमन्ना थी , कई वर्ष हुए उसे देखा नहीं ।
कीटागाकी को शिष्य लेकर अंदर गया और उसने गुरु के चरण छूवे और क्षमा मांगी कि पहले मैं पद और राज्य साथ ले आया था, अब मैं ही आया हूँ,
गुरु ने कहा कि जीवन में पद और प्रतिष्ठा से पहचान नहीं बनती, अपने अंदर के गुणों से पहचान बनती है ।कई देर तक गुरु शिष्य ज्ञान चर्चा करते रहे ।
शिक्षा: इस छोटी सी कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारा पद महत्वपूर्ण नहीं होता है हमारा व्यक्तित्व महत्वपूर्ण होता है शिष्य को अपने गुरु से मिलने के लिए कीटागाकी का पद काम नहीं आया उसका अपना व्यक्तित्व ही काम आया इसलिए हमें अपने पद प्रतिष्ठा आदि का दिखावा नहीं करना चाहिए।
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